खेरोदा में ‘सुख विपाक’ सूत्र वाचन के साथ आध्यात्मिक स्वाध्याय शिविर का भव्य शुभारंभ
खेरोदा में ‘सुख विपाक’ सूत्र वाचन के साथ आध्यात्मिक स्वाध्याय शिविर शुरू, कोमल मुनि ने अपेक्षाओं के त्याग को बताया दुखों का समाधान।

तस्वीर में खेरोदा के एक सभागार में आयोजित चातुर्मास के दौरान मंच पर विराजमान संत और नीचे बैठे हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
खेरोदा कस्बे में चातुर्मास के दौरान आध्यात्मिक स्वाध्याय शिविर का प्रथम दिन मंगलमय वातावरण में प्रारंभ हुआ। इस अवसर पर गुरुदेव कोमल मुनि जी के अनमोल वचनों का स्मरण कराते हुए बताया गया कि मनुष्य जीवन में दुखों के आने का मूल कारण उसकी असीम और अनपेक्षित अपेक्षाएं हैं। यदि व्यक्ति जीवन में किसी से भी अत्यधिक अपेक्षा रखना छोड़ दे तो दुखों के कारण स्वतः समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि जहां अपेक्षा नहीं होती, वहां दुख का वास नहीं हो सकता।
शिविर के प्रथम दिन अध्ययनशील एवं सेवारत्न हर्षित मुनि ने ‘सुख विपाक’ सूत्र के दूसरे और तीसरे अध्ययन का प्रभावशाली, विस्तृत एवं सजीव वाचन किया। उन्होंने उपस्थित साधकों और धर्मप्रेमियों को महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। साथ ही जीवन में अधिक से अधिक स्वाध्याय करने और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करने का संकल्प दिलाया।
प्रवचन के दौरान संतों के समागम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि संसार में चिंतामणि और पारसमणि को दुर्लभ माना जाता है, लेकिन साधु-संतों का समागम उससे भी अधिक दुर्लभ है। गुरु भगवंत ने अपने सुख-दुखों का त्याग कर केवल हमारे कल्याण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया है। ऐसे महान गुरुदेव के उपकारों को जीवन में कभी नहीं भूलना चाहिए।
गुरु भगवंत ने स्वयं ईर्ष्या, तुलना और प्रतिस्पर्धा से रहित निर्मल जीवन जीकर निष्कपट और सरल जीवन का मार्ग दिखाया है। मुनि श्री ने समझाया कि केवल बड़ी-बड़ी बातें करने या दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं ऊंचा उठने का प्रयास करने से सही मार्ग प्रशस्त नहीं होता। छल-कपट और चालाकी से प्राप्त सफलता कभी बहादुरी नहीं कहलाती, क्योंकि छल का सहारा लेने वाला व्यक्ति कभी पूजनीय और सम्मान योग्य नहीं बन सकता।
उन्होंने कहा कि वस्तु-स्वरूप के ज्ञान के अभाव में ही मनुष्य की नियत खोटी होती है और इसी खोटी नियत से कषाय, ईर्ष्या तथा तुलना जैसी आत्मघाती प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं। ईर्ष्या और तुलना ऐसी भयानक आग हैं, जो मनुष्य को भीतर ही भीतर जलाती रहती हैं और उसकी विवेक-बुद्धि को नष्ट कर देती हैं।
स्वाध्याय शिविर के प्रथम दिन सभी साधकों ने अपनी अपेक्षाओं का त्याग करने, छल-कपट और तुलना की भावना से दूर रहने, अपनी नियत को शुद्ध बनाने तथा परम पूज्य गुरु भगवंत के उपकारों का स्मरण करते हुए उनके दिखाए निष्कपट मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने का संकल्प लिया। इस स्वाध्याय अभियान के माध्यम से अंचल में धर्म की ऐसी धारा प्रवाहित हुई, जिसमें सभी ने बढ़-चढ़कर सहभागिता कर लाभ प्राप्त किया।

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