अमरपुरा खालसा में मां खेड़ाखूट की महाआरती, नवमी पर निकलेगा ऐतिहासिक नेजा
खेरोदा के निकट अमरपुरा खालसा में नवरात्रि की अष्टमी पर मां खेड़ाखूट की महाआरती हुई। नवमी पर देव स्नान के बाद दोपहर 12 बजे कालका माता मंदिर से ऐतिहासिक नेजा निकलेगा, जिसे देखने हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे।

खेरोदा के अमरपुरा खालसा गांव में नवरात्रि अष्टमी पर मां खेड़ाखूट मंदिर परिसर में विशेष महाआरती और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान प्रस्तुत कला और भक्ति का दृश्य।
खेरोदा। खेरोदा कस्बे के निकटवर्ती अमरपुरा खालसा गांव में नवरात्रि के अवसर पर मां खेड़ाखूट के दरबार में अष्टमी को भव्य महाआरती का आयोजन हुआ। माता के जयकारों से क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। नवमी के दिन गांव में माता की पारंपरिक सवारी निकाली जाएगी और दोपहर 12 बजे कालका माता मंदिर परिसर से क्षेत्र की ऐतिहासिक नेजा परंपरा का आयोजन होगा, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
नवरात्रि की अष्टमी अमरपुरा खालसा गांव के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है। इस अवसर पर मां खेड़ाखूट के पावन प्रांगण में आयोजित महाआरती में स्थानीय ग्रामीणों के साथ आसपास के गांवों और दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचे। माता के दर्शन और आरती में भाग लेने के लिए भक्तों में उत्साह रहा। सामूहिक आयोजन में गांव की सामाजिक एकता, धार्मिक आस्था और लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिली।
नवमी के अवसर पर गांव में माता की पारंपरिक सवारी निकाली जाएगी। इसके तहत विभिन्न मंदिरों के देव विग्रहों को गाजे-बाजे और धार्मिक विधि-विधान के साथ गांव की प्राचीन बावड़ी पर ले जाया गया, जहां पवित्र देव स्नान की रस्म पूरी की गई। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न इस धार्मिक अनुष्ठान को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
नवमी पर दोपहर ठीक 12 बजे कालका माता मंदिर परिसर से क्षेत्र का ऐतिहासिक और प्रसिद्ध नेजा निकाला जाएगा। अमरपुरा खालसा का यह नेजा मेवाड़ अंचल की प्राचीन लोकपरंपराओं में विशेष स्थान रखता है। स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, मां खेड़ाखूट अपने पंखे के माध्यम से संकेत देकर नेजे को स्वयं नचाती हैं। माता की कृपा और चमत्कार से जुड़ी इस परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मां खेड़ाखूट की महाआरती, नवमी पर देव स्नान और ऐतिहासिक नेजा परंपरा अमरपुरा खालसा के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा गांव की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के साथ नई पीढ़ी तक इसकी आध्यात्मिक विरासत पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है।

