कानोड़ में जलझूलनी एकादशी पर राम रेवड़ी परंपरा, राजमहल चौक में हुआ पूजन
मेवाड़ के कानोड़ में करीब दो शताब्दियों पुरानी जलझूलनी एकादशी परंपरा के तहत विभिन्न समाजों के बेवानों का राजमहल चौक में सामूहिक पूजन किया गया।

तस्वीर में फूलों की मालाओं और आभूषणों से सजे भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह के दर्शन हो रहे हैं।
कानोड़ की जलझूलनी एकादशी मेवाड़ की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ सामाजिक समरसता की भी विशिष्ट पहचान बन चुकी है। भाद्रपद शुक्ल एकादशी को आयोजित होने वाले इस पर्व पर कानोड़ नगरी के विभिन्न समाजों के मंदिरों से भगवान के बेवान निकलते हैं और शाम करीब 3 बजे राजमहल चौक में एकत्रित होते हैं। यहां कानोड़ के महारावत द्वारा सभी बेवानों का पूजन किया जाता है। अलग-अलग समाजों की धार्मिक परंपराओं का एक ही स्थान पर एकत्र होना इस आयोजन को सामाजिक सद्भावना की जीवंत मिसाल बनाता है।
कानोड़ नगरी में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। नगर के अनेक मंदिरों और लोक परंपराओं में श्रीकृष्ण भक्ति की झलक दिखाई देती है। स्थानीय लोगों के अनुसार कानोड़ नाम की पहचान भी भगवान श्रीकृष्ण के नाम से जुड़ी मानी जाती है। इसी कारण यहां अनेक परिवार अपने बच्चों के नाम कान्हा, किशन और कन्हैया जैसे कृष्ण से जुड़े नाम रखते हैं।
कानोड़ की भक्ति परंपरा में प्रेमबाई पुरोहित का नाम भी श्रद्धा से लिया जाता है। वे अपने प्रत्येक कार्य को ठाकुर श्री गोपाल राय को समर्पित करते हुए कहा करती थीं, “अच्छा हुआ तो भी तेरा और बुरा हुआ तो भी तेरा।” भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य और सखा मानने वाली युवा टीम भी आज इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
भाद्रपद शुक्ल एकादशी को देवझूलनी एकादशी या जलझूलनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह को सुसज्जित बेवान में विराजमान किया जाता है। बेवान की आकर्षक सजावट के बाद नगर भ्रमण की परंपरा निभाई जाती है।
कानोड़ में राम रेवड़ी की यह परंपरा करीब दो शताब्दियों पुरानी बताई जाती है। डॉ. पूनम पाठक की पुस्तक में उपलब्ध उल्लेख के अनुसार, इसकी शुरुआत कानोड़ के रावत अजित सिंह के समय हुई थी। गुरुवार, 19 सितंबर 1839 को उन्होंने आठ आना राम रेवड़ियों को चढ़ाए। उस समय बिना किसी जातिगत भेदभाव के सभी राम रेवड़ियों की पूजा कानोड़ के महारावत द्वारा की गई।
परंपरा के अनुसार प्रत्येक राम रेवड़ी में पांच फल, चार भुट्टे और एक केला अर्पित किया जाता था। इसके साथ एक रुपया और नारियल भी भेंट किया जाता था।
राम रेवड़ी की परंपरा का सबसे भावपूर्ण पक्ष गोपालजी की राम रेवड़ी से जुड़ा है। परंपरा के अनुसार कानोड़ के महारावत स्वयं अथवा उनके ज्येष्ठ पुत्र नंगे पैर राम रेवड़ी को अपने कंधे पर रखकर राजमहल से गोपालजी मंदिर तक लेकर जाते थे। आज भी कानोड़ के महारावत योगेश्वर सिंह इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था और सामाजिक एकता को जोड़ने का कार्य कर रही है।
जलझूलनी एकादशी के दिन कानोड़ के विभिन्न समाजों के मंदिरों से निकलने वाले बेवान शाम करीब 3 बजे राजमहल चौक में पहुंचते हैं। यहां सभी बेवानों का एक साथ पूजन होता है। अलग-अलग समाजों की धार्मिक परंपराओं का एक ही स्थान पर एकत्र होना कानोड़ की सामाजिक एकता की विशेष पहचान है। यह दृश्य धार्मिक आस्था के साथ यह संदेश भी देता है कि विविधताओं के बावजूद पूरा नगर एक-दूसरे की आस्था और परंपराओं का सम्मान करते हुए एक साथ खड़ा है।
वर्तमान में जलझूलनी एकादशी के इस आयोजन को ‘कानोड़ दिवस’ के रूप में भी मनाया जा रहा है। इस अवसर पर कानोड़ से बाहर रहने वाले प्रवासी लोग भी अपने आराध्य भगवान के दर्शन और नगर भ्रमण में शामिल होने के लिए विशेष रूप से कानोड़ पहुंचते हैं। इससे पर्व का स्वरूप व्यापक हुआ है और नई पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रही है।
व्याख्याता निर्मल कुमार पुरोहित ने बताया कि कानोड़ का यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एकता का त्योहार है। सभी जातियों और समाजों के लोग एक साथ एकत्रित होते हैं तथा आपसी सौहार्द और भाईचारे का जो दृश्य देखने को मिलता है, वह कानोड़ की विशिष्ट पहचान है।
तुलसी अमृत उच्च प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक दीपक शर्मा बताते हैं कि वे बचपन से भगवान के दर्शन करते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार की भगवान गोपाल के प्रति गहरी आस्था रही है। इसी आस्था के कारण उनका नाम भी ‘गोपाल’ रखा गया। कानोड़ के तीन वर्षों के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक “जय श्री गोपाल” के रूप में अभिवादन करने की परंपरा है।
कानोड़ की जलझूलनी एकादशी में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था, सदियों पुरानी राम रेवड़ी परंपरा, महारावत परिवार की भूमिका और विभिन्न समाजों की सामूहिक भागीदारी एक साथ दिखाई देती है। यही वजह है कि यह आयोजन कानोड़ के धार्मिक जीवन के साथ उसकी सामाजिक एकता और सामाजिक सद्भावना की पहचान बन चुका है।

Bharat Jaroli, Udaipur
नाम: भरत कुमार जारोली
वर्तमान पद: संवाददाता (प्रातः काल)
कार्यक्षेत्र: कानोड़ (तहसील: कानोड़, जिला: उदयपुर, राजस्थान)
बीट : स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय
परिचय
भरत कुमार जारोली राजस्थान के उदयपुर जिले के अंतर्गत आने वाले कानोड़ तहसील और उसके आसपास के क्षेत्रों के वरिष्ठ संवाददाता हैं। वह अपने क्षेत्र में पुलिस थाना, अस्पताल, स्थानीय प्रशासन, राजनीति, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापारिक गतिविधियों सहित सभी विषयों पर नियमित रूप से समाचार कवर करते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
भरत कुमार जारोली को पत्रकारिता के क्षेत्र में 35 वर्षों का लंबा और व्यापक अनुभव है। वह साल 1982 से लगातार 'प्रातः काल' दैनिक समाचार पत्र के साथ जुड़े हुए हैं। इससे पूर्व वह 'राजस्थान पत्रिका' (उदयपुर) से जुड़े हुए थे, जहाँ उन्होंने 35 वर्षों तक नियमित रूप से काम किया।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने अपनी शिक्षा हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की है।
