श्रद्धालु महिलाओं द्वारा मेहंदी, हल्दी, कुमकुम और अभीर से माता की विधिवत पूजा अर्चना की गई। इस दौरान देवी को दही चांवल और ढोकले का विशेष भोग लगाया गया। पूजा संपन्न होने के बाद महिलाओं ने समूह में बैठकर देवी शीतला की कथा सुनने और सुनाने का कार्य किया।

प्रकृति संरक्षण और जीवन में सौम्यता का संदेश

महिला व्रत-उपवास से जुडी शिक्षिका रेखा त्रिपाठी, तरूलता, पुष्पलता और पुष्पा श्री माली ने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि "माता शीतला का यह पर्व सनातन काल से चला आ रहा है जो प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है।" रेखा त्रिपाठी ने आगे जानकारी दी कि "जीवन व स्वभाव में शीतलता ओर सौम्यता की सीख भी देता है शीतला माता का व्रत।"

ऋतु परिवर्तन और अन्न की महत्ता

कथा वाचन के दौरान पुष्प लता, तरूलता व आशा चौहान ने श्रद्धालुओं को बताया कि "यह पर्व प्रकृति के ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देता है तो बास्योडा का भोग बताता है कि अन्न नारायण का स्वरूप है उसे झुठा नहीं छोडना चाहिए।" कथा श्रवण के बाद महिलाओं ने सात्विकता से संकल्प के साथ माता से सुख समृद्धि ओर आरोग्य कि कामना की।

Pratahkal Bureau

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