रामदेवजी के अवतरण से पहले ही चरम पर था कामड़ संप्रदाय, जानिए इतिहास और मान्यताएं
राजस्थान के कामड़ संप्रदाय का इतिहास, धार्मिक मान्यताएं, अलख-उपासना, हिंगुलाज शक्तिपीठ और बाबा रामदेवजी से जुड़ी परंपराओं का विस्तृत विवरण सामने आता है। जानिए कामड़ों की पूजा और दास्य-भाव की परंपरा।

तस्वीर में बाईं ओर एक व्यक्ति चश्मा और नारंगी गमछा पहने हुए तथा दाईं ओर एक महिला नजर आ रही हैं।
राजस्थान की जातीय संरचना में कामड़ संप्रदाय का अपना विशिष्ट महत्व रहा है। यह संप्रदाय लोक एवं अभिजात्य वर्ग से जुड़े विभिन्न अनुष्ठानों के कर्ता-धर्ता के रूप में जाना जाता है और वैष्णव बैरागियों से अलग इसकी अपनी धार्मिक परंपराएं रही हैं। कामड़ संप्रदाय एकेश्वरवाद का प्रचारक और मूलतः शाक्त मतावलंबी रहा है। इसकी आधारभूत आराधना देवी हिंगुलाज माता से जुड़ी रही है, जिनका स्थान वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगोल पर्वत के पास स्थित गुफा में बताया गया है। मान्यता है कि यहां विष्णु के चक्र से शक्ति का ब्रह्मरंध्र कटकर गिरा था। इसे देश के पांच शक्तिपीठों में प्रधान शक्तिपीठ माना जाता है।
बाद में कामड़ संप्रदाय शिव-आराधक बना। कामड़ों के गेय भजनों और वाणियों में शिव को ‘आदनाथ’ रूप में स्मरण कर गाया जाता है। इनमें कहा गया है, “आदनाथ, गणपतजी ने समरांने, हिड़दा में सुरसत माँई है ...ए.. जी। आटठू पैर धण्यांने समरां, संकट मेटो म्हारो साँई, ओ बापजी, आरोध्या बेगा आई है ...ए...जी।”
कामड़ों ने वैष्णवों की तरह दास्य-भाव क्यों स्वीकारा, इसका संबंध राजा बलि की कथा से जोड़ा जाता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर ब्राह्मण के वेश में राजा बलि से केवल तीन कदम भूमि मांगी, तब बलि ने ब्राह्मण देवता से अपनी इच्छा के अनुसार भूमि लेने को कहा। भगवान विष्णु ने पहला बायां कदम जुँजाला ग्राम में रखा, जो वर्तमान राजस्थान के नागौर जिले में कुचामन सिटी के समीप बताया गया है। दूसरा कदम मक्का मदीना में रखा गया, जिसे इस्लाम धर्म के अनुयायी ‘कदम-रसूल’ कहकर पूजते हैं। तीसरा कदम राजा बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल में पहुंचाया गया और उनका गर्व नष्ट किया गया।
इस प्रसंग को कामड़ों की वाणी में इस प्रकार कहा गया है, “पेलो पाँव धरयोअंदात्ता, जूँजाला रे माई। दूजो पाँव धरयोम्हारा दात्ता मक्का मदीना माँई। तीजो पाँव बलि रे माथे, सत पाताल पठाई।”
कथा के अनुसार उस पांव को ‘समस-ऋषि’ पाताल लोक में तपस्यारत अपने गुरु ‘फुंवारा-ऋषि’ से लेकर जुँजाला ग्राम आए। कामड़ के सहयोग से उसे उतरवाकर वहीं स्थापित किया गया और उसकी पूजा का दायित्व कामड़ को सौंपा गया। इसके बाद कामड़ अपने नाम के साथ ‘दास’ शब्द लगाने लगे। बाबा रामदेवजी के अवतरण से पूर्व कामड़ संप्रदाय के जजमान ‘नाथ-सम्प्रदाय’ के जोगी थे।
समस-ऋषि को मूल रूप से अरब देश के बल्ख-बुखारी के सूफी संत के रूप में बताया गया है। उनका वास्तविक नाम ‘शम्सुद्दीन तबरेज’ था। उनके द्वारा वहां स्थापित धूणी कामड़ों की छह धूणियों में सबसे प्राचीनतम मानी जाती है और कामड़ों में ‘समशाणी धूणी’ के रूप में विख्यात है। समस पीर में मुर्दे को जीवित करने की क्रिया बताई गई है। अंत में उन्होंने मुलथान में जाकर जीवित समाधि ले ली। इसी कारण एक वाणी में कहा गया है, “पाँव थाप्यो अलख को, समसपीर गुसांई। एक पाँव अलख की पूजा, जूंजाला के माही।”
रामदेवजी के 33 वर्ष की अल्प आयु में जीवित समाधि लेने के पश्चात कामड़ों ने विष्णु के बाएं चरण के साथ रामदेवजी का दायां चरण जोड़कर ‘पगल्या’ यानी विष्णु के दोनों चरणों की पूजा शुरू की।
कामड़ संप्रदाय में ‘अलख-उपासना’ की परंपरा भी इसकी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। वैदिक काल में कर्म के आधार पर जातियां बननी शुरू हुई थीं। ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त’ में चार वर्णों का स्पष्ट उल्लेख है। कामड़ लोग भी आर्य थे, लेकिन ब्राह्मणों की तरह जनेऊ एवं चोटी धारण नहीं करते थे। वे वेदों के प्रशंसक थे, लेकिन यज्ञ में दी जाने वाली पशु-बलि के विरोधी थे। उस समय उन्हें ‘ब्रात्य सन्यासी’ कहा जाता था।
कामड़ों द्वारा गाई जाने वाली निर्गुण वाणियों से यह ज्ञात होता है कि वे वेदों में वर्णित ‘परंब्रह्म’ यानी निराकार सर्वेश्वर को अपना ‘अलख’ मानते हैं, जिसने शिव-शक्ति को अवतरित किया। अलख की अभिव्यक्ति ‘ओ३म्’ शब्द में निहित मानी गई है। इसलिए कामड़ों की लोकभाषा में बोले जाने वाले प्रत्येक जाप-शब्द को शुरू करने से पहले ‘ओम गुरुजी’ का उच्चारण किया जाता है।
स्रोत में बताया गया है कि लेखक के पिता किशनदासजी जब ‘वीर-विक्रमादित्य’ की कथा आरंभ करते थे, तब सर्वप्रथम गजानंद, सरस्वती एवं अलख को तंदूरे, मंजीरों एवं ढोलक के साथ गाते थे। उस वाणी में कहा गया है, “ए .. पेलां समरूँ गजानंद देव, रदसद रा भण्डार भर देव। दूजा समरूँ सुरसत माँय, भूल्या अकसर देय बताय। तीजा समरूँ ‘अलख-नजार’ लख-चौरासी काटणहार।”
अतः कुल मिलाकर परंब्रह्म यानी निराकार के साथ विष्णु भगवान को भी कामड़ों ने ‘अलख’ कहा है। इसके बाद सन् 4352 में अवतरित तंवर कुल भूषण ‘विष्णु के अंशावतार बाबा रामदेवजी’ को भी ‘अलख-धणी’ नाम से संबोधित किया गया। कामड़ संप्रदाय के साधु आज भी कमंडल या चरवी लेकर प्रातः गांव में भिक्षाटन के लिए जाते हैं और उस समय ‘अलख’ का उच्चारण लंबे स्वर में करते हैं, जबकि वैष्णव साधुओं में ‘भजलो राम’ बोला जाता है।
राजस्थान में इस संप्रदाय के चार रूप देखने को मिलते हैं। इनमें अलख उपासी संत कामड़, तेरहताल वादक कामड़ संत, मालवा के बैरागी और गुजरात के कापड़ी नाथ शामिल हैं।
त्रेता युग में तेरहताल वादक कामड़ एवं कापड़ी नाथ कामड़ के उल्लेख को लेकर ‘राजस्थान के लोक-नृत्य’ नामक ग्रंथ की लेखिका डॉ. शकुंतला बापना के अनुसार, विष्णु के पूर्ण अवतार भगवान श्री रामचन्द्र जी के पूर्वज ‘इक्ष्वाकुवंशी राजाओं’ के समय आकर्षक तेरहताल वादन यानी हिंगलाज-स्तुति को हस्तिनापुर में एकटक देखने से शत्रुओं ने उन पर अचानक आक्रमण कर परास्त कर दिया। इसके बाद इक्ष्वाकुवंशी राजाओं ने तेरहताल वादक कामड़ों को हस्तिनापुर से बाहर निकाल दिया और वे वर्तमान राजस्थान क्षेत्र यानी मारवाड़ में आकर बस गए।
भगवान श्री रामचन्द्र जी ब्रह्महत्या यानी रावण-वध के दोष से मुक्त होने के लिए देवी ‘हिंगुलाज शक्तिपीठ’ गए। वहां कुंभोदर सिद्ध के कहने पर लालू एवं जसराज कापड़ी नाथ यानी कामड़ ने हिंगुलाज माई के पास स्थित कण्डीर-कुण्ड में स्नान आदि करवाकर और हिंगलाज पुरसाकर की संपूर्ण पूजा पद्धति कर भगवान राम को पाप से मुक्त करवाया। भगवान राम ने अपना पीताम्बर, कुंडल एवं स्वर्ण-आभूषण उन दोनों भाइयों को दान में दिए।
कामड़ संप्रदाय को अलग-अलग काल और क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है। इनमें काम्बड़, कामद, कामर, कोबर, कामरिया, कापड़िया, गोसाई, कापड़ी नाथ, कामड़िया, कांबड़िया तथा कामड़-योगी नाम शामिल हैं। इन सभी नामों और संबोधनों के बावजूद आज सभी संप्रदाय वाले एवं स्वयं कामड़ साधु अपने को ‘कामड़’ नाम से ही संबोधित करना पसंद करते हैं।
ब्यावर के समीप लसानी ग्राम के निवासी संत प्रतापदासजी कामड़ ने सन् 4945 में ‘कामद शब्द प्रमाण’ नामक स्वरचित पुस्तक में कामड़ का मूल शब्द ‘कामद’ माना है। उन्होंने कामद के पर्यायवाची शब्द सिद्धिवान, चेतन स्वरूप, वीतराग, अकामी, शब्दभेदी, पारायणी, प्रमाणी, क्षय वासना, चेतन पुरुष, कायाकल्पी, निजारी, सचियार एवं गुसांई बताए हैं।
महाराष्ट्र प्रान्त के मूल निवासी तथा ‘जोधपुर राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान’ में ‘उपनिदेशक’ पद से सेवा-निवृत्त डॉ. डी. बी. क्षीर सागर ने कामड़ शब्द का प्रयोग तीन रूपों में किया है। प्रथम काम्बर, द्वितीय काम्बड़ एवं तृतीय काम्बड़िया। काम्बर शब्द का प्रयोग भाटी हरिनंद कृत ‘रुपाँदेजी री वेल’ में किया गया है, जो डॉ. क्षीर सागर जी की कृति में संग्रहित है। इसका अर्थ ‘धूणी-धरमी’ के रूप में दिया गया है।

Vikas Chawada (Udaipur)
नाम: विकास चावड़ा
वर्तमान पद: संवाददाता (दैनिक प्रातःकाल, फतहनगर क्षेत्र)
कार्यक्षेत्र: फतहनगर, तहसील: मावली, जिला: उदयपुर (राजस्थान)
अनुभव: साल 2020 से लगातार सक्रिय
बीट और मुख्य विषय
- स्थानीय समाचार: तहसील मावली के विभिन्न गांवों सहित फतहनगर-सनवाड़ पालिका क्षेत्र के स्थानीय समाचारों की नियमित कवरेज।
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शैक्षणिक योग्यता (Education)
हायर सेकेंडरी
