104 वर्ष बाद जवास ठिकाने में लौटी राजतिलक परंपरा, वैदिक विधि से राव ऋतु राज सिंह का हुआ राजतिलक
खेरवाड़ा के जवास ठिकाने में 104 वर्ष बाद ऐतिहासिक राजतिलक परंपरा का पुनर्स्मरण हुआ। राव ऋतु राज सिंह का वैदिक रीति-रिवाजों से राजतिलक संपन्न हुआ, जिसमें विभिन्न समाजों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। जानिए इस ऐतिहासिक आयोजन की पूरी कहानी और इसकी सांस्कृतिक महत्ता।

तस्वीर में जवास ठिकाने के राजतिलक समारोह के दौरान सफेद पोशाक और गुलाबी पगड़ी पहने राव ऋतु राज सिंह हाथ जोड़े बैठे नजर आ रहे हैं।
खेरवाड़ा के जवास ठिकाने के इतिहास में बुधवार का दिन ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण बन गया, जब लगभग 104 वर्ष बाद ठिकाने की राजतिलक परंपरा का पुनर्स्मरण हुआ। स्वर्गीय रेखा बा (राव साहब तख्त सिंह की सुपुत्री) के ज्येष्ठ पुत्र राव ऋतु राज सिंह का राजतिलक समारोह जवास की राणी साहिबा दशरथ कुंवर की गरिमामयी उपस्थिति एवं आशीर्वाद में वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ।
राजतिलक संस्कार का वैदिक विधि-विधान के साथ संपादन विख्यात विद्वान शास्त्री भगवती लाल व्यास ने मंत्रोच्चार के बीच कराया। समारोह के दौरान परंपराओं और ऐतिहासिक मर्यादाओं का पूर्ण रूप से निर्वहन किया गया। आयोजकों के अनुसार इतिहास संबंधी अभिलेखों एवं प्रकाशित ग्रंथों के आधार पर राजतिलक की परंपरा का पालन किया गया।
इस अवसर पर थाणा, खुणादरी, झुथरी, परेडा और बायडी सहित क्षेत्र के राजपूत समाज के लोग, जवास ग्राम के ब्राह्मण एवं राजपूत समाज, पंचाल समाज, मुस्लिम समाज तथा अन्य समुदायों के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। विभिन्न समाजों की सहभागिता ने सामाजिक समरसता, परस्पर सम्मान और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1922 में राव साहब तख्त सिंह जी का राजतिलक हुआ था। उसके बाद पहली बार 104 वर्ष पश्चात यह ऐतिहासिक परंपरा पुनः संपन्न हुई, जिससे जवास ठिकाने की गौरवशाली विरासत का पुनर्जीवन हुआ।
राजतिलक के उपरांत पारंपरिक सम्मान के रूप में बंदूकों की सलामी देकर इस ऐतिहासिक अवसर का अभिनंदन किया गया। यह आयोजन केवल राजतिलक समारोह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जवास ठिकाने की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक सौहार्द के पुनर्जागरण का एक यादगार अध्याय बन गया।

Dinesh Kumar Jain, Kherwara(Udaipur)
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