युग लगता है किसी एक को अटल बिहारी होने में: उदयपुर में अटल जयंती पर सजी काव्य संध्या, शब्दों में जीवित हुआ राष्ट्रपुरुष का व्यक्तित्व
उदयपुर में अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर श्रमजीवी महाविद्यालय सभागार में “एक शाम अटल जी के नाम” काव्य संध्या का आयोजन हुआ। समाजसेवी, जनप्रतिनिधि और कवियों की उपस्थिति में अटलजी के जीवन, विचार और राष्ट्रनिष्ठा को ओज, भक्ति और हास्य रस की कविताओं से सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया।

उदयपुर, 25 दिसम्बर। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के अवसर पर उदयपुर में विचार, कविता और राष्ट्रबोध का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रमजीवी महाविद्यालय के सभागार में अटल बिहारी वाजपेयी जन्म शताब्दी समारोह समिति के तत्वावधान में आयोजित “एक शाम अटल जी के नाम” काव्य संध्या ने श्रोताओं को भावनात्मक और वैचारिक रूप से गहराई तक छुआ। पूरा वातावरण अटलजी की स्मृतियों, उनकी काव्यात्मक संवेदना और राष्ट्रनिष्ठा से सराबोर रहा।
समारोह में समाजसेवी जगदीश चन्द्र जोशी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत, विधायक ताराचंद जैन, विधायक फूलसिंह मीणा, पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी, वंदना मीणा, सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक प्रमोद सामर और पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान के राज्यपाल के सलाहकार प्रो. के.सी. सोडानी ने की।
समारोह का शुभारंभ मां सरस्वती एवं अटल बिहारी वाजपेयी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। प्रारंभिक संबोधन में भाजपा शहर जिलाध्यक्ष गजपालसिंह राठौड़ ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अटलजी के जीवनवृत्त, उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता और राष्ट्रसेवा पर प्रकाश डाला। भाजपा जिला महामंत्री देवीलाल सालवी, डॉ. पंकज बोराणा, उपाध्यक्ष दिग्विजय श्रीमाली, करणसिंह शक्तावत, तुषार दवे और कार्यक्रम संयोजक डॉ. विजय विप्लवी सहित अन्य पदाधिकारियों ने मंचासीन अतिथियों और कवियों का सम्मान किया।
काव्य संध्या का शुभारंभ कवयित्री दीपिका माही की सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात डॉ. विजय विप्लवी ने अटल बिहारी वाजपेयी की प्रसिद्ध कविता ‘ठन गई मौत से ठन गई’ का सशक्त पाठ कर संध्या की भूमिका बांधी। हास्यकवि डाडम चंद डाडम ने अटलजी के कार्यकाल और उनके निर्णयों को स्मरण करते हुए श्रोताओं को भावुक और मुस्कराने पर विवश कर दिया। वीर रस के कवि बृजराज सिंह जगावत ने ‘अटल प्रण की धरा पर मेवाड़ स्वाभिमान जिंदा है’ का ओजस्वी पाठ कर वातावरण को राष्ट्रभाव से भर दिया।
श्रेणीदान चारण ने ‘भारत भू पर हुआ एक अवतारी था, भारत रत्न मां का सपूत वो अटलबिहारी था’ पंक्तियों के माध्यम से अटलजी को काव्यांजलि अर्पित की। दीपिका माही ने भक्ति रस से ओतप्रोत गीतों की प्रस्तुति देकर सभागार को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया। वरिष्ठ कवि प्रकाश नागोरी ने ‘धीर, वीर, गंभीर राष्ट्र के अनुपम पुजारी, तुम मरकर भी अमर हो गए, जय हो अटल तुम्हारी’ रचना का पाठ कर अटलजी के अमर व्यक्तित्व को शब्दों में सजीव किया।
कार्यक्रम में डॉ. कुंजन आचार्य ने ‘मुझको टिकट दिला भगवान’ कविता के माध्यम से राजनीति में टिकटार्थियों के मनोभावों का सटीक और व्यंग्यात्मक चित्रण प्रस्तुत किया। वहीं वीर और ओज रस के कवि सिद्धार्थ देवल ने ‘सत्ता की हल्की पगडंडी के यूं भारी होने में, युग लगता है किसी को अटलबिहारी होने में’ सुनाकर काव्य संध्या को शिखर तक पहुंचा दिया।
कार्यक्रम का संयोजन देवीलाल सालवी और डॉ. कुंजन आचार्य ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कुंजन आचार्य द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह काव्य संध्या न केवल अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्मरण करने का अवसर बनी, बल्कि नई पीढ़ी के लिए उनके विचारों और मूल्यों को आत्मसात करने का प्रेरक मंच भी सिद्ध हुई।
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