युद्ध की विभीषिका: उदयपुर की लेखिका हेमलता पालीवाल ने शब्दों में पिरोई मानवता की सिसकियाँ!
उदयपुर की प्रसिद्ध कवयित्री हेमलता पालीवाल ने अपनी नई रचना के माध्यम से वैश्विक युद्धों के मानवीय संकट और परमाणु हथियारों के विनाशकारी परिणामों पर चिंता जताई है।

उदयपुर। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्ध की विभीषिका ने संपूर्ण मानवता को संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। चारों ओर व्याप्त अशांति और विनाशकारी संघर्षों के बीच मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं। इसी हृदयविदारक पीड़ा और वैश्विक अस्थिरता को उदयपुर मूल की प्रसिद्ध लेखिका एवं कवयित्री हेमलता पालीवाल ने अपनी लेखनी के माध्यम से अत्यंत मार्मिक रूप में पिरोया है। उनकी यह प्रस्तुति सत्ता और आधिपत्य की अंधी दौड़ में झुलसती दुनिया की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ बारूद के ढेर पर बैठी सभ्यता अपने ही अंत की पटकथा लिख रही है। लेखिका के अंतर्मन से उपजी यह वेदना न केवल युद्ध के भयावह तांडव को दर्शाती है, बल्कि आधुनिक हथियारों के युग में सिसकती शांति की पुकार को भी स्वर देती है।
प्रस्तुति: युद्ध की विभीषिका
हर तरफ हाहाकार, चीत्कार,
मौत का भयावह तांडव सा मंजर।
मानवता कराह रही है आज,
खामोश हैं संवेदनाओं के अंदर।
अमानुषिक वृतियों के साए में,
विनाश के आयुध सजाए गए,
दुनिया को बारूद के ढेर पर बिठाकर,
श्मशान बनाने के सपने बुने गए।
भस्मासुर सी ये मिसाइलें,
पलक झपकते ही सब कुछ हर लेती हैं,
जीवन, सपने, आशाएं, रिश्ते—
एक ही क्षण में राख कर देती हैं।
कुछ सिसकियां, कुछ आहें,
असहनीय पीड़ा का समंदर,
गम, शोक और टूटे दिलों का,
बिखरा हुआ हर एक मंजर।
भविष्य की अनिश्चित राहों में,
जीवन जीने की अनचाही जद्दोजहद,
सिसकती, गमगीन आंखें अब,
पत्थर सी होकर थम गई हैं।
जल, थल और नभ के कोनों से,
बारूद की बारिश होती है,
परमाणु हथियारों की छाया में,
मानवता हर पल रोती है।
नासमझ हाथों में ताकत आकर,
तबाही का खेल रचाती है,
एक गलत निर्णय ही दुनिया को,
मिट्टी में मिला सकती है।
आधिपत्य और अधिग्रहण की,
अंधी दौड़ में अंधे इंसान,
अपनी ही सभ्यता को आज,
खुद कर रहे हैं श्मशान।
कब समझेगा ये मानव जग,
शांति ही जीवन का सार है,
वरना ये धरती भी एक दिन,
सिर्फ राख का संसार है।
:✍️ हेमलता पालीवाल, उदयपुर (राजस्थान)
हेमलता पालीवाल की यह रचना वर्तमान समय की सबसे बड़ी त्रासदी पर एक गहरा प्रहार है। यह कविता स्पष्ट करती है कि यदि समय रहते आधिपत्य और विस्तारवाद की इस अंधी दौड़ को नहीं रोका गया, तो मानवीय सभ्यता का अस्तित्व केवल इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएगा। यह संदेश वैश्विक समाज के लिए एक चेतावनी है कि शांति के बिना विकास की कल्पना निरर्थक है।

मनीष पालीवाल
मनिष पालीवाल, मुंबई स्थित अनुभवी पत्रकार हैं, जो सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय खबरों की रिपोर्टिंग में माहिर हैं। अपनी गहन जांच और सटीक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाने वाले मनिष हमेशा ताजा और विश्वसनीय समाचार पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। उनके लेखों में निष्पक्षता, तथ्यपरक विश्लेषण और स्थानीय घटनाओं की गहराई दिखाई देती है, जिससे पाठकों को समाचार का पूरा परिप्रेक्ष्य समझ में आता है। प्रात:काल में, मनिष पालीवाल की रिपोर्टिंग ने पाठकों के बीच विश्वास और लोकप्रियता दोनों ही अर्जित की है। मुलरुप से पालीवाल मेवाड़ नाथद्वारा क्षेत्र के केसुली गांव के निवासी है। यह दै.प्रात:काल के साथ 2003 से कार्यरत है।
