श्री द्वारिकाधीश महिला मंडल द्वारा मुद्द्गल वाटिका में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान के दौरान व्यासपीठ से समुद्र मंथन और शिव-लीला प्रसंगों का वाचन किया गया।

श्री द्वारिकाधीश महिला मंडल के पावन तत्वावधान में फतहनगर के मुद्द्गल वाटिका के सुरम्य परिसर में 25 से 31 मई 2026 तक आयोजित सात दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के पंचम दिवस पर शुक्रवार को श्रद्धा और भक्ति का अभूतपूर्व सैलाब उमड़ पड़ा। कथा-मर्मज्ञ व्यास पंडित श्री माणक चन्द जी मेनारिया के मुखारविंद से प्रवाहित हुई शिव-लीलाओं की दिव्य और अलौकिक धारा ने पावन परिसर में मौजूद प्रत्येक श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध और भाव-विभोर कर दिया। अलौकिक प्रसंगों की इस श्रृंखला ने श्रद्धालुओं को गहरे आध्यात्मिक रस में सराबोर कर दिया।

धार्मिक अनुष्ठानों के सुनियोजित क्रम में प्रातःकाल 8 बजे संपूर्ण वातावरण वेद-मंत्रों की मधुर स्वर-लहरियों एवं मंगल वाद्यों की गूंज से गुंजायमान हो उठा। इस पावन बेला में विद्वान आचार्यों के निर्देशन में पार्थिव शिवलिंग का शास्त्रोक्त विधि से निर्माण किया गया तथा षोडशोपचार पूजन-अर्चन की समस्त प्रक्रियाएं अत्यंत श्रद्धाभाव के साथ संपन्न की गईं। इसके पश्चात, अपराह्न 2 बजे संपूर्ण पंडाल में शिव-स्तुति के सस्वर पाठ के साथ मुख्य कथा का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसने श्रोताओं को एकाग्रचित्त कर दिया।

व्यासपीठ से कथा की मुख्य धारा को आगे बढ़ाते हुए पंडित माणक चन्द जी मेनारिया ने शिव-पार्वती विवाह के उपरांत हिमालय से माता पार्वती की करुणामयी और मार्मिक विदाई का अत्यंत सजीव चित्रण किया, जिसे सुनकर उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखें सजल हो उठीं। उन्होंने एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग की व्याख्या करते हुए बताया कि कैलाश पर्वत पर देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित जिस भव्य एवं दिव्य प्रासाद को बनाया गया था, उसे परम दयालु भगवान शिव ने लंकाधिपति रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर दक्षिणा स्वरूप प्रदान कर दिया था।






शिव-परिवार के अलौकिक विस्तार का विस्तृत वर्णन करते हुए व्यासश्री ने षडानन भगवान कार्तिकेय के प्रादुर्भाव की कथा सुनाई। इसके पश्चात माता पार्वती के उबटन से प्रथम पूज्य श्रीगणेश के जन्म का दिव्य प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कथाक्रम में शिशु गणेश द्वारा माता की आज्ञा का अक्षरशः पालन करने हेतु शिवगणों से किए गए ऐतिहासिक युद्ध, तत्पश्चात भगवान शिव द्वारा अनजाने में उनका शिरोच्छेदन किए जाने तथा अंततः गजमुख लगाकर उन्हें पुनर्जीवन प्रदान करने की संपूर्ण अलौकिक और सजीव कथा का तार्किक वर्णन किया गया। इसके साथ ही, समस्त चराचर जगत में गणपति के अग्रपूज्य होने के शास्त्रीय महत्व और उनके सर्वोच्च स्थान को भी विस्तार से स्पष्ट किया गया।

व्यासजी ने शिव-परिवार को संपूर्ण सृष्टि के लिए एक आदर्श और अनुकरणीय उदाहरण बताते हुए पुरजोर शब्दों में कहा कि माता-पिता की आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन करना ही मानव जीवन का सर्वोच्च धर्म और कर्तव्य है। इसी आध्यात्मिक संदर्भ को जोड़ते हुए कार्तिकेय एवं गणेश जी के विवाह के पावन प्रसंगों का सुंदर उल्लेख किया गया। इसके उपरांत, कथा में कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध की वीरगाथा, देव-दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के जटिल घटनाक्रम तथा संपूर्ण सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव द्वारा भयंकर हलाहल विष का पान कर नीलकंठ बनने की परम करुणामयी गाथा का अत्यंत विस्तृत व हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया।

इस आध्यात्मिक महाप्रवाह के समापन सत्र में वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य महारास का भावपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत किया गया। व्यासश्री ने बताया कि गोलोक के इस अद्भुत रास का साक्षी बनने के लिए स्वयं देवाधिदेव महादेव भगवान शिव भी माता पार्वती सहित गोपी रूप धारण कर रास मंडल में सम्मिलित हुए थे। इस परम पावन और हृदयस्पर्शी चित्रण ने पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आनंद के चरम पर पहुंचाकर भाव-विभोर कर दिया।

भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के प्रकोप को देखते हुए आयोजकों द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा गया। कथा पंडाल में शीतल जल की आधुनिक फॉगिंग प्रणाली एवं उच्च क्षमता के कूलरों की उत्तम व्यवस्था सुनिश्चित की गई, जिसकी कथा श्रवण करने आए सभी आगंतुकों ने मुक्त कंठ से सराहना की। सायं 5 बजे शंखनाद की गंभीर ध्वनि एवं डमरू के मंगल नाद के साथ भगवान शिव की भव्य महाआरती उतारी गई, जिसके पश्चात उपस्थित जनसमुदाय में श्रद्धापूर्वक महाप्रसाद का वितरण किया गया। धर्म, संस्कृति और सनातन संस्कारों की अलख जगाने वाला यह भव्य कथा-महोत्सव आगामी 31 मई तक मुद्द्गल वाटिका में अनवरत रूप से जारी रहेगा।

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