फतहनगर के अम्बेश मेमोरियल संस्थान में धर्मसभा: युवाचार्य महेंद्र ऋषि ने दिया प्रवचन
श्रमणसंघीय महेंद्र ऋषिजी ने सुनने की कला और आत्मिक विकास पर दिए विचार, श्रमण विहार के सेवाभावी कार्यकर्ताओं का किया गया सम्मान।

फतहनगर के अम्बेश मेमोरियल संस्थान पावनधाम में आयोजित धर्मसभा के दौरान उदयपुर श्रमण विहार में उत्कृष्ट सेवा देने वाले पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को सम्मानित करते अतिथि और जैन समाज के प्रबुद्ध जन।
“सुनना” और “बोलना” केवल सामान्य क्रियाएं नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, संस्कार और आत्मिक विकास की आधारशिला हैं। जो व्यक्ति सही अर्थों में सुनना सीख जाता है, वही सही बोलने और जीवन को उचित दिशा में आगे बढ़ाने की क्षमता प्राप्त करता है। यह विचार शुक्रवार को अम्बेश मेमोरियल संस्थान पावनधाम में आयोजित धर्मसभा में श्रमणसंघीय महेन्द्र ऋषिजी ने व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि अधिकांश लोग सुनने से अधिक बोलना चाहते हैं। हर व्यक्ति अपनी बात कहने की जल्दी में रहता है, लेकिन जो धैर्य, विनम्रता और मननपूर्वक सुन सकता है, वही जीवन में वास्तविक उपलब्धि प्राप्त करता है। उन्होंने कहा कि सुनना केवल कानों का कार्य नहीं, बल्कि मन और चेतना की सजग साधना है। जब मनुष्य श्रेष्ठ विचारों, सद्वचनों और धर्म संदेशों को गंभीरता से सुनता है, तभी वे उसके जीवन परिवर्तन का कारण बनते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में मुख्यतः तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं। एक वे, जिनके मुख से मधुरता, शांति और प्रेम बरसता है तथा जिनके वचन वातावरण को आनंदमय बना देते हैं। दूसरे वे लोग होते हैं, जो कम बोलते हैं, लेकिन अपने कर्मों से पहचान बनाते हैं। उनके कार्य ही उनकी वाणी बन जाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके शब्दों और व्यवहार में स्थिरता एवं संवेदनशीलता का अभाव रहता है, जिससे जीवन में समरसता नहीं बन पाती।
युवाचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति जितना ध्यानपूर्वक सुनना सीखता है, उसका चिंतन उतना ही परिष्कृत होता जाता है। सुनना ही सीखने का प्रथम सोपान है। गुरु, धर्म और महापुरुषों के वचनों को श्रद्धा से सुनने वाला व्यक्ति भीतर से निर्मल, जागरूक और विवेकशील बनता है। इसलिए जीवन में केवल बोलने की कला नहीं, बल्कि सुनने की साधना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जिसका सुनना श्रेष्ठ होता है, उसका सुधरना भी निश्चित होता है। अच्छे विचारों को सुनना, उनका मनन करना और उन्हें जीवन में धारण करना ही वास्तविक साधना है। महापुरुषों का स्मरण, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और धर्म के प्रति आस्था ही आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।
धर्मसभा में महासती सुचेताजी एवं उपप्रवर्तिनी प्रफूलाजी की सुशिष्या प्रज्ञाश्रीजी ने कहा कि फतहनगर की भूमि सदैव से संतों, महापुरुषों और आध्यात्मिक संस्कारों की पावन धरती रही है। यहां की धार्मिक चेतना लोगों को गुरु और भगवान से जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने भजनों के माध्यम से श्रद्धा और भक्ति के भाव भी व्यक्त किए।
पावनधाम फतहनगर के महामंत्री दिनेश सिंघवी ने बताया कि धर्मसभा में उपप्रवर्तक कोमल मुनिजी, हितमित भाषी हितेंद्र ऋषिजी आदि ठाणा, महाराष्ट्र उपप्रवर्तिनी प्रफूलाजी, राजस्थान उपप्रवर्तिनी विजयप्रभाजी, महासती विद्याश्रीजी आदि ठाणा तथा उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योति जी, महासती महिमाश्रीजी आदि ठाणा का सानिध्य प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर उदयपुर श्रमण विहार में सेवा देने वाले पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का सम्मान किया गया। अंबेश पावनधाम के प्रमुख प्रकाश चंद्र सिंघवी, कोषाध्यक्ष दिनेश सिंघवी, उपाध्यक्ष गजेन्द्र चंडालिया, फतहनगर श्रीसंघ के दिनेश सांभर, आशीष पीपाड़ा, निलेश पोखरणा, मनोज कोठारी तथा गवारड़ी के अनिल सिंघवी सहित अन्य पदाधिकारियों ने श्रमणविहार कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया।
धर्मसभा में सनवाड़, नाथद्वारा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बैंगलौर और मुम्बई सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति रही। धर्मसभा में व्यक्त विचारों ने सुनने की साधना, आत्मिक जागरूकता और भक्ति के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का संदेश दिया।

Pratahkal Bureau
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