दिगम्बर जैन संत प्रशंसा सुनते ही क्यों बंद कर लेते हैं आंखें? पुष्पगिरि में दिखा साधना का संदेश
पुष्पगिरि में संतों की बंद आंखों ने प्रशंसा और सम्मान से परे साधना, समता और आत्मचिंतन का गहरा संदेश दिया।

सोनकच्छ स्थित पुष्पगिरि में पट्ट-विभूषण संस्कार अलंकरण का भव्य कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। यह अवसर इसलिए विशेष रहा कि आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने अपने शिष्य आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज को नवीन पद से विभूषित किया। आयोजन के दौरान संतों के व्यवहार की एक विशेष बात ने ध्यान आकर्षित किया। जब किसी संत की प्रशंसा की जाती, वे शांत भाव से अपनी आंखें बंद कर लेते थे।
जब आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज अपने शिष्य को अलंकृत कर रहे थे, तब मुनि श्री प्रसन्न सागर जी महाराज शांत भाव से बैठे रहे। उनकी दोनों आंखें बंद थीं। चेहरे पर न प्रसन्नता के भाव थे, न उत्साह का प्रदर्शन और न ही किसी प्रकार का अहंकार। वे बिल्कुल सहज और निर्विकार दिखाई दे रहे थे।
दूसरे दिन भी अनेक संत मंच पर उपस्थित थे। गुरु अपने शिष्य की और शिष्य अपने गुरु की प्रशंसा कर रहे थे तथा उनके गुणों का वाचन किया जा रहा था। इस दौरान विशेष रूप से देखा गया कि जिस समय किसी संत की अपनी प्रशंसा हो रही थी, वे शांत भाव से अपनी आंखें बंद कर लेते थे।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनकी बंद आंखें कह रही हों, “हम यहां प्रशंसा सुनने नहीं, स्वयं को छोड़ने आए हैं। हम तो संसार के मान-सम्मान और मोह-ममता का त्याग करने निकले हैं, फिर इन पदों और प्रशंसाओं में हमें क्यों बांधा जा रहा है?”
उनके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं था। आंखें बंद थीं, शरीर स्थिर था और मन शांत दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वे बाहरी प्रशंसा से अपने मन को अलग करके भीतर की ओर देख रहे हों। मानो बंद आंखों के पीछे णमोकार मंत्र की ध्वनि चल रही हो और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौट रही हो।
मनुष्य का सामान्य स्वभाव है कि जब कोई उसकी प्रशंसा करता है तो उसके चेहरे पर खुशी आ जाती है। वह अपने आपको अच्छा महसूस करता है। कभी-कभी प्रशंसा सुनने की इच्छा भी पैदा हो जाती है। यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है।
अन्य परंपराओं के संतों और बाबाओं के प्रति जब प्रशंसा के शब्द कहे जाते हैं, तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव दिखाई देना भी स्वाभाविक है। उदाहरण के रूप में बाबा रामदेव को भी विभिन्न अवसरों पर अपनी प्रशंसा के समय प्रसन्नता व्यक्त करते हुए देखा गया है। इसमें कोई विशेष दोष नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की सामान्य भाव-प्रतिक्रिया है।
लेकिन दिगम्बर जैन संतों की साधना का स्वरूप ही उन्हें इस सामान्य प्रतिक्रिया से अलग करता है। जिसकी प्रशंसा हो रही हो, वह भी निर्विकार रहे और जिसकी आलोचना हो, वह भी निर्विकार रहे—यही साधना की ऊंचाई है।
दिगम्बर मुनि के लिए मान और अपमान, प्रशंसा और निंदा, सुख और दुःख—इन सबके बीच समता बनाए रखना साधना का महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए जब उनकी प्रशंसा होती है और वे आंखें बंद कर लेते हैं, तो वह केवल आंखें बंद करना नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा का संकेत भी हो सकता है।
आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ने पहले दिन अपने शिष्य को पट्ट-विभूषण संस्कार से अलंकृत किया। दूसरे दिन आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज की कठिन तपस्या और उपवास की साधना को देखते हुए उन्हें चक्रवर्ती-पट्ठ विभूषण से भी अलंकृत किया गया।
इसके बाद सभी साधुओं ने मिलकर आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज को गणधराचार्य पद से विभूषित किया।
जैन धर्म की मूल व्यवस्था में पंचपरमेष्ठी के पांच पद माने गए हैं—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु। वर्तमान काल में हमारे सामने आचार्य, उपाध्याय और साधु पद के साधक प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान हैं।
समाज और श्रावकों की श्रद्धा, भक्ति तथा सम्मान की भावना से समय-समय पर संतों को विभिन्न प्रकार के सम्मान और अलंकरण दिए जाते हैं। इनका उद्देश्य संत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करना होता है। सम्मान देने वाले के मन में भक्ति होती है और सम्मान पाने वाले संत के लिए उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि वह इस सम्मान के बीच भी अपने भीतर के अहंकार को जागने न दे।
पुष्पगिरि के इस आयोजन में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली बात कोई पद, अलंकरण या प्रशंसा नहीं, बल्कि संतों की बंद आंखें रहीं। कभी-कभी शब्दों से अधिक प्रभाव मौन का होता है। उसी प्रकार कभी-कभी खुली आंखों से अधिक संदेश बंद आंखें दे जाती हैं।
उन बंद आंखों में जैसे एक संदेश छिपा था—“प्रशंसा आपकी है, सम्मान आपका है; हमें तो केवल अपनी आत्मा को देखना है।”
शायद यही कारण है कि दिगम्बर संत की साधना केवल वस्त्रों का त्याग नहीं है। यह मान, अभिमान, प्रशंसा, प्रतिष्ठा और अहंकार से ऊपर उठने की साधना भी है।
यदि प्रशंसा सुनकर आंखें चमक उठें, तो वह सामान्य मनुष्य का स्वभाव है। लेकिन प्रशंसा सुनकर भी आंखें बंद हो जाएं, मन शांत रहे और चेहरे पर कोई विशेष प्रतिक्रिया न आए, तो यह साधना की ओर संकेत करता है।
सच्ची वीतरागता शायद वही है, जहां सम्मान मिले तो मन न फूले, अपमान मिले तो मन न टूटे; प्रशंसा मिले तो अहंकार न आए और आलोचना हो तो क्रोध न आए।
पुष्पगिरि में संतों की बंद आंखों ने शायद यही संदेश दिया। आंखें बंद थीं, लेकिन संदेश बहुत स्पष्ट था—“बाहर की प्रशंसा नहीं, भीतर की आत्मा को देखो।” यही बंद आंखें यह सोचने का अवसर देती हैं कि सच्ची साधुता पद में नहीं, पद मिलने के बाद भी पद से ऊपर उठ जाने में है।

Dharnendra Jain( Kherwara)
नाम: धरणेन्द्र जैन
वर्तमान पद: सीनियर रिपोर्टर (प्रातः काल दैनिक, खेरवाड़ा विधानसभा)
कार्यक्षेत्र: खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र (खेरवाड़ा, ऋषभदेव, और नयागांव उपखंड क्षेत्र, जिला उदयपुर, राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, प्रशासन सहित सभी क्षेत्रों की खबरें
अनुभव: 30 वर्ष से अधिक
परिचय
धरणेन्द्र जैन उदयपुर जिले के खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के एक अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातः काल दैनिक' में सीनियर रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वह मुख्य रूप से खेरवाड़ा, ऋषभदेव और नयागांव उपखंड क्षेत्र को कवर करते हैं। धरणेन्द्र जैन राजनीति, क्राइम, स्थानीय प्रशासन सहित क्षेत्र के सभी प्रमुख विषयों पर नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
धरणेन्द्र जैन को पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों (30 वर्ष) से अधिक का व्यापक और लंबा अनुभव है:
- वह साल 1995 से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर कार्यरत हैं।
- उन्होंने वर्ष 1998 से 2018 तक लगातार 20 वर्षों तक 'दैनिक भास्कर' में खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के लिए सीनियर रिपोर्टिंग की है।
- वर्ष 2018 से वह लगातार 'प्रातः काल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र की कमान संभाल रहे हैं।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
