सेवा के प्रति निष्ठा ही सच्चा धर्म: समिधा आश्रम में हाईकोर्ट जज डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी का उद्बोधन
उदयपुर के समिधा आश्रम में राजस्थान हाईकोर्ट के जज डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने सेवा को परम धर्म बताते हुए निस्वार्थ कार्यों की महत्ता पर जोर दिया। कार्यक्रम में निराश्रित बच्चों की बढ़ती लापता घटनाओं और सेवा संस्थानों की चुनौतियों पर गंभीर मुद्दे उठाए गए। समाज और प्रशासन की संयुक्त जिम्मेदारी पर बल दिया गया।

उदयपुर में गुरुवार को समिधा आश्रम का वातावरण तब विशेष रूप से भावुक और प्रेरणादायी हो उठा, जब राजस्थान हाईकोर्ट के जज डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने सेवा की वास्तविक परिभाषा को अपने ओजपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया। “सेवा परमो धर्म:” के मूल मंत्र पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इस विचार को जीवन में उतार लेता है, उसका कल्याण इसी जन्म में सुनिश्चित हो जाता है और उसे मोक्ष की चिंता नहीं करनी चाहिए। उनके उद्बोधन ने उपस्थित जनसमूह को गहराई से प्रभावित किया।
समिधा संस्थान द्वारा निराश्रित और दृष्टिहीन बच्चों के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए जज भाटी ने कहा कि आज के दौर में निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करना किसी कठिन चुनौती से कम नहीं है। उन्होंने संस्थान की प्रतिबद्धता को समाज के लिए मिसाल बताया। इस अवसर पर जिला न्यायाधीश ज्ञान प्रकाश गुप्ता ने भी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सामान्य नागरिक अपने परिवार के लिए तो हर संभव प्रयास करता है, लेकिन निराश्रित बच्चों के लिए सेवा का भाव केवल महान विचारधारा वाले लोग ही रखते हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ चित्तौड़गढ़ सांसद सीपी जोशी, राज्यसभा सांसद चुन्नीलाल गरासिया, चित्तौड़ विधायक चंद्रभानसिंह आक्या, वल्लभनगर विधायक उदयलाल डांगी, सलूंबर विधायक शांता देवी, भाजपा देहात जिलाध्यक्ष पुष्कर तेली और शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह की उपस्थिति में हुआ।
कार्यक्रम के दौरान एक चिंताजनक तथ्य भी सामने आया। राजस्थान बाल सलाहकार समूह के अध्यक्ष डॉ. चंद्रगुप्त सिंह चौहान ने बताया कि पिछले चार वर्षों में उदयपुर संभाग से छह सौ से अधिक निराश्रित बच्चे लापता हुए हैं। इनमें से बड़ी संख्या मजबूरी में बाल श्रमिक बन गई। चौहान ने यह भी खुलासा किया कि कुछ स्वार्थी सरकारी अधिकारियों द्वारा की जा रही अनावश्यक प्रताड़ना से तंग आकर कई संचालकों ने निराश्रित बाल गृह तक बंद कर दिए। उनका कहना था कि यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो समाज के सबसे कमजोर वर्ग के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
समिधा आश्रम में हुई यह चर्चा न केवल सेवा के महत्व को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि समाज की जिम्मेदारी सिर्फ संवेदनाओं तक सीमित नहीं हो सकती। निराश्रित बच्चों के भविष्य की रक्षा के लिए प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर कदम उठाने होंगे, तभी वास्तविक सेवा का उद्देश्य पूर्ण होगा।
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