दशलक्षण महापर्व 16 सितंबर से: दस दिनों में बाहरी उत्सव नहीं, भीतर की यात्रा का संकल्प
दिगंबर जैन परंपरा में 16 सितंबर 2026 से दशलक्षण महापर्व शुरू होगा। दस धर्मों की साधना के साथ पर्व बाहरी आयोजन नहीं, बल्कि क्रोध, अहंकार, लोभ और कषायों से मुक्ति की भीतर की यात्रा का संदेश देता है।

दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार पावन दशलक्षण महापर्व 16 सितंबर 2026 से प्रारंभ होने जा रहा है। श्वेतांबर जैन परंपरा के अनुसार पर्वराज पर्युषण शुरू हो चुका है। दशलक्षण महापर्व के दौरान धार्मिक आयोजन, विधान और प्रवचन होंगे तथा श्रद्धा-भक्ति का वातावरण बनेगा। हालांकि जैन परंपरा में इस पर्व का वास्तविक स्वरूप बाहरी उत्सव, सजावट, मिठाइयों, मेलों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं माना गया है। यह बाहरी उल्लास से अधिक अंतर्मन के उल्लास, भोग के बजाय योग और त्याग, प्रदर्शन के बजाय परिष्कार तथा संसार की ओर बढ़ने के बजाय स्वयं की ओर लौटने का अवसर है।
दसलक्षण धर्म यानी पर्युषण पर्व के फल के बारे में आचार्य कार्तिकेय स्वामी ने लिखा है, “एदे दहप्पयारा पाव कम्मस्स णासिया भणिया। पुण्णस्स संजणाया पर पुण्णत्थं ण कायव्वा।” धर्म के ये दस भेद पाप कर्म का नाश करने वाले और पुण्य का प्रादुर्भाव करने वाले बताए गए हैं। इसे पुण्य के पालक और पाप के प्रक्षालक के रूप में भी समझा जा सकता है।
‘पर्युषण’ का भाव आत्मा के समीप आने से जुड़ा है। इन दिनों मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप के निकट पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। बाहरी संसार की आपाधापी से विराम लेकर अपने भीतर झांकना, अपने दोषों को पहचानना और आत्मगुणों को विकसित करना पर्व का मूल प्रयोजन है।
जैन दर्शन में आत्मा का स्वभाव अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति से संपन्न माना गया है। कर्मों और कषायों के आवरण के कारण उसका प्रकाश ढका हुआ है। दशलक्षण महापर्व इन आवरणों को हटाने की साधना का अवसर देता है। इसलिए यह केवल मंदिर जाने का नहीं, मन के मंदिर को निर्मल करने का पर्व है।
दशलक्षण पर्व के दस दिन आत्मशुद्धि की दस सीढ़ियां माने गए हैं। सुप्रसिद्ध जैनाचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थ सूत्र में दस धर्मों के नाम बताते हुए सूत्र दिया है, “उत्तमक्षमामार्दवार्जव शौच सत्य संयम तप त्यागाकिंचन्य ब्रह्मचर्याणि धर्म:”। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दस धर्म हैं।
उत्तम क्षमा क्रोध से मुक्त करती है। उत्तम मार्दव अहंकार को गलाता है। उत्तम आर्जव जीवन में सरलता और निष्कपटता लाता है। उत्तम शौच लोभ और आंतरिक मलिनता को दूर करता है। उत्तम सत्य वाणी और व्यवहार को पवित्र करता है। उत्तम संयम इंद्रियों और इच्छाओं पर अंकुश लगाता है। उत्तम तप आत्मबल को जाग्रत करता है। उत्तम त्याग संग्रह की मानसिकता को कम करता है। उत्तम आकिंचन्य ‘मेरा-मेरा’ की भावना से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। उत्तम ब्रह्मचर्य आत्मशक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाता है। इस तरह दशलक्षण केवल दस शब्द नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाली दस दिशाएं हैं।
पर्व की सफलता मंदिर की भीड़ से नहीं, बल्कि कषायों की कमी से मापे जाने का संदेश भी दशलक्षण की साधना में निहित है। आचार्य उमास्वामी के तत्त्वार्थसूत्र का मंगलाचरण इसी आध्यात्मिक लक्ष्य को सामने रखता है, “मोक्षमार्गस्य नेतारं, भेत्तारं कर्मभूभृताम्। ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां, वन्दे तद्गुणलब्धये॥” इसका अर्थ है कि जो मोक्षमार्ग के नेता हैं, कर्मरूपी पर्वतों के भेत्ता हैं और समस्त तत्त्वों के ज्ञाता हैं, उन वीतराग परमेष्ठी को उनके गुणों की प्राप्ति के लिए नमस्कार किया जाता है। दशलक्षण की साधना का सार पूज्य के गुणों का केवल स्मरण करना नहीं, बल्कि उन गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास है।
दशलक्षण पर्व के दौरान यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या यह पर्व वास्तव में जीवन को बदल रहा है। मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है, धार्मिक आयोजन भव्य हो रहे हैं, पूजा-पाठ और विधान का विस्तार हो रहा है, लेकिन उसी अनुपात में क्रोध कम हुआ या नहीं, अहंकार घटा या नहीं, छल-कपट कम हुआ या नहीं और लोभ पर अंकुश लगा या नहीं, यह आत्ममंथन का विषय है। यदि दस दिनों तक धर्म की चर्चा के बाद भी व्यवहार पहले जैसा रहे, छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आए, अपमान सहन न हो, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या हो, असत्य और छल को व्यवहार की चतुराई समझा जाए तथा संग्रह की दौड़ जारी रहे, तो दशलक्षण पर्व के मर्म पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
पर्व की सार्थकता इस बात में नहीं है कि कितनी पूजा की गई, कितने उपवास किए गए या कितने धार्मिक आयोजन हुए। इसकी वास्तविक सार्थकता इस बात में है कि भीतर क्या बदला।
आज दशलक्षण महापर्व भी कहीं-कहीं बाह्य आडंबर की चकाचौंध में अपना मूल स्वरूप खोता दिखाई देता है। उत्साह, श्रद्धालु, आयोजन, सजावट और प्रचार मौजूद हैं, लेकिन उसी अनुपात में आत्मचिंतन और आत्मानुशासन दिखाई देना सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि साधना करने वाले लोग नहीं हैं। समाज में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे श्रावक-श्राविकाएं हैं जो निष्ठापूर्वक व्रत, उपवास, स्वाध्याय, संयम और आत्मचिंतन करते हैं। उनकी साधना वंदनीय है। किसी भी परंपरा की शक्ति उसके आदर्शों के साथ-साथ उसके आत्मनिरीक्षण में भी होती है। इसलिए विसंगतियों पर बात करना धर्म की आलोचना नहीं, बल्कि धर्म के मर्म की रक्षा का प्रयास है।
क्षमा पर्व दशलक्षण की साधना का महत्वपूर्ण आयाम है। कहीं-कहीं क्षमा भी औपचारिकता बनती दिखाई देती है। संदेश भेजकर एक-दूसरे से क्षमा मांग लेने के बाद अगले ही दिन वही कटुता, शिकायत और अहंकार लौट आए तो क्षमा का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। क्षमा केवल शब्दों में ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहना नहीं, बल्कि मन से द्वेष को विसर्जित करना है। जिस व्यक्ति ने चोट पहुंचाई, उसके प्रति भीतर की कटुता समाप्त हो और जिन लोगों को दुख पहुंचाया गया, उनके प्रति अपने व्यवहार का ईमानदारी से परीक्षण किया जाए, तभी क्षमा आत्मा का आभूषण बनती है।
दशलक्षण पर्व में व्रत और उपवास की विशेष महत्ता है। उपवास केवल भोजन से विरति का नाम नहीं है। यदि अन्न का त्याग हो गया लेकिन क्रोध का त्याग नहीं हुआ, भोजन कम हो गया लेकिन लोभ नहीं घटा, शरीर तप गया लेकिन अहंकार बढ़ गया, तो साधना अधूरी रह जाती है। सच्चा उपवास वह है जिसमें केवल पेट नहीं, विकार भी खाली हों। व्रत शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, आत्मबल को जाग्रत करने के लिए है। इसलिए उपवास के साथ विचारों की शुद्धि, वाणी का संयम, व्यवहार की सरलता और कषायों पर नियंत्रण भी आवश्यक है।
धार्मिक आयोजनों के लिए समाज से सहयोग लेना परंपरा का हिस्सा हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर चंदा संग्रह, आर्थिक अपारदर्शिता अथवा कमीशन की प्रवृत्ति जैसी विसंगतियां चिंता का विषय हैं। दान का उद्देश्य धर्मकार्य में सहयोग है, व्यक्तिगत लाभ अथवा आर्थिक व्यवस्था में अनैतिक हिस्सेदारी नहीं। जब धर्म के नाम पर अर्थ प्रमुख हो जाता है, तब धर्म की आत्मा पीछे छूटने लगती है। धार्मिक संस्थाओं और आयोजकों के लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिकता उतनी ही आवश्यक है जितनी पूजा-पद्धति और आयोजन की भव्यता।
आज जीवन बाजारवादी संस्कृति से प्रभावित है और हर पर्व के साथ उपभोग बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में दशलक्षण महापर्व इच्छाओं को सीमित करने, संग्रह घटाने, संयम अपनाने और भीतर के सुख को पहचानने की जीवन-दृष्टि देता है। जैन दर्शन का ‘अपरिग्रह’ तनावग्रस्त समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। जितना अधिक संग्रह, उतनी अधिक चिंता और जितनी अधिक इच्छाएं, उतनी अधिक बेचैनी। इसके विपरीत संयम मनुष्य को भीतर से हल्का करता है। दशलक्षण केवल धार्मिक कैलेंडर की दस तिथियां नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलित और शांत बनाने का दर्शन है।
इस दशलक्षण महापर्व पर मंदिर जाने के साथ भीतर जाने, पूजा करने के साथ अपने दोषों की पहचान और परिष्कार करने, व्रत रखने के साथ कषायों को क्षीण करने, क्षमा मांगने के साथ क्षमा करने, दान देने के साथ उसमें पारदर्शिता और निस्वार्थता रखने तथा धर्म सुनने के साथ उसे आचरण में उतारने का संकल्प इस साधना के मूल भाव को सामने रखता है। धर्म की पहचान शब्दों से नहीं, व्यवहार से होती है।
दशलक्षण महापर्व संसार से भागने की नहीं, संसार में रहते हुए स्वयं को बदलने की प्रेरणा देता है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, कपट के स्थान पर सरलता, लोभ के स्थान पर संतोष, असंयम के स्थान पर संयम, भोग के स्थान पर तप, संग्रह के स्थान पर त्याग और अपरिग्रह इस महापर्व की वास्तविक उपलब्धि के रूप में सामने आते हैं।
पर्व तब सार्थक होगा जब दस दिनों के बाद घरों की सजावट भले उतर जाए, लेकिन भीतर के संस्कार बने रहें। मंदिरों के ध्वज अपनी जगह स्थिर रहें, लेकिन जीवन की दिशा बदल जाए। पर्व समाप्त हो जाए, लेकिन दशलक्षण आचरण में निरंतर जीवित रहें। इसीलिए दशलक्षण महापर्व को केवल मनाने के बजाय जीने और केवल धर्म की चर्चा करने के बजाय धर्म को चर्या बनाने का संदेश दिया गया है।
दस दिवस का यह पर्व दस दीपों की ज्योति के समान है, जिसमें हर कषाय के क्षय की अंतर्यात्रा निहित है। मंदिर में जलता दीप क्षणभर जग को रोशन कर सकता है, लेकिन मन में जलने वाला आत्मदीप ही दशलक्षण की साधना की वास्तविक जीत है। यही पर्युषण का सार, दशलक्षण की साधना और जिनवाणी का जीवन-संदेश है—“विकारों से विरक्ति, आत्मा से अनुरक्ति और जीवन में दशलक्षण धर्म की अभिव्यक्ति।”

Dharnendra Jain( Kherwara)
नाम: धरणेन्द्र जैन
वर्तमान पद: सीनियर रिपोर्टर (प्रातः काल दैनिक, खेरवाड़ा विधानसभा)
कार्यक्षेत्र: खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र (खेरवाड़ा, ऋषभदेव, और नयागांव उपखंड क्षेत्र, जिला उदयपुर, राजस्थान)
बीट (मुख्य विषय): राजनीति, क्राइम, प्रशासन सहित सभी क्षेत्रों की खबरें
अनुभव: 30 वर्ष से अधिक
परिचय
धरणेन्द्र जैन उदयपुर जिले के खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के एक अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। वर्तमान में वह 'प्रातः काल दैनिक' में सीनियर रिपोर्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वह मुख्य रूप से खेरवाड़ा, ऋषभदेव और नयागांव उपखंड क्षेत्र को कवर करते हैं। धरणेन्द्र जैन राजनीति, क्राइम, स्थानीय प्रशासन सहित क्षेत्र के सभी प्रमुख विषयों पर नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।
पत्रकारिता का अनुभव (Work Experience)
धरणेन्द्र जैन को पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों (30 वर्ष) से अधिक का व्यापक और लंबा अनुभव है:
- वह साल 1995 से पत्रकारिता क्षेत्र में निरंतर कार्यरत हैं।
- उन्होंने वर्ष 1998 से 2018 तक लगातार 20 वर्षों तक 'दैनिक भास्कर' में खेरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के लिए सीनियर रिपोर्टिंग की है।
- वर्ष 2018 से वह लगातार 'प्रातः काल' समाचार पत्र से जुड़े हुए हैं और क्षेत्र की कमान संभाल रहे हैं।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने वाणिज्य स्नातक (B.Com) की डिग्री हासिल की है।
