आकोला। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के आकोला में ग्राम पंचायत से नगरपालिका बनने के बाद विकास की उम्मीदें तो जगी थीं, लेकिन इसके साथ ही भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के हौसले भी बुलंद हो गए हैं। पिछले डेढ़ वर्ष के भीतर कस्बे की बेशकीमती जमीनों पर अवैध कब्जों की बाढ़ सी आ गई है। सरकारी तंत्र को चुनौती देते हुए अतिक्रमणकारियों ने न केवल जमीनों को घेरा है, बल्कि गौचर और नगरपालिका की आरक्षित भूमि पर पक्के मकान तक खड़े कर दिए हैं। प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस खेल ने अब एक गंभीर मोड़ ले लिया है, जिससे स्थानीय स्तर पर भारी आक्रोश व्याप्त है।

हैरानी की बात यह है कि जब भी इन अवैध निर्माणों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो अतिक्रमणकारी धड़ल्ले से ग्राम पंचायत के पुराने पट्टों का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये भूखंड या तो गौचर भूमि के अंतर्गत आते हैं या फिर सीधे तौर पर नगरपालिका की मिल्कियत हैं। अब तक इस पूरे प्रकरण में नगरपालिका के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है। बार-बार अखबारों में सुर्खियां बनने और जनसुनवाई में शिकायतें होने के बावजूद, जिम्मेदार अधिकारी 'कुंभकर्णी नींद' में सोए नजर आ रहे थे। हाल ही में आकोला थाने में आयोजित सीएलजी (CLG) की बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा था, जहां स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन की उदासीनता पर तीखे सवाल खड़े किए थे।

लगातार बढ़ते दबाव और अव्यवस्था को देखते हुए आखिरकार प्रशासन हरकत में आया है। उपखण्ड अधिकारी महेश गगोरिया के कड़े रुख और स्पष्ट आदेशों के बाद नगरपालिका प्रशासन ने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ी है। बुधवार को नगरपालिका द्वारा एक आधिकारिक नोटिस जारी कर सभी अतिक्रमणकारियों को सात दिन का अंतिम अल्टीमेटम दिया गया है। इस नोटिस के माध्यम से यह साफ कर दिया गया है कि यदि तय समय सीमा के भीतर अवैध निर्माण स्वयं नहीं हटाए गए, तो प्रशासन बलपूर्वक उन्हें ध्वस्त करने की कार्रवाई करेगा।

इतना ही नहीं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आलम यह है कि फतहनगर रोड पर ग्राम पंचायत और नगरपालिका द्वारा पूर्व में किए गए पौधरोपण और सुरक्षा के लिए की गई तारबंदी को भी दरकिनार कर दिया गया है। वर्तमान में आकोला नगरपालिका की कार्यप्रणाली 'राम भरोसे' दिखाई दे रही है, लेकिन उपखण्ड अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद अब कस्बे के लोगों को यह उम्मीद जागी है कि सार्वजनिक भूमि को इन कब्जों से मुक्त कराया जा सकेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सात दिन की मोहलत खत्म होने के बाद प्रशासन वास्तव में कितना सख्त कदम उठाता है या फिर यह कार्रवाई महज कागजी नोटिस तक ही सिमट कर रह जाएगी।

Pratahkal Bureau

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