उदयपुर। भारत की सांस्कृतिक एकता के सूत्रधार भगवत्पाद जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का प्राचीन मेवाड़ से गहरा और अटूट संबंध रहा है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं वेदांत भारती, बेंगलुरु के संयुक्त तत्वावधान में जवाहरनगर स्थित सिंधु-भवन में आयोजित 'जगद्गुरु शंकराचार्य और मेवाड़' विषयक विचारगोष्ठी में यह तथ्य प्रमाणों के साथ उभरकर सामने आया। इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में यडतोरे योगानन्देश्वर मठ के अध्यक्ष और वेदान्त भारती के संस्थापक शंकरभारती महास्वामी की गरिमामयी उपस्थिति रही। महास्वामी वर्तमान में आदि शंकराचार्य की तत्कालीन भारत यात्रा के मार्गों और प्रवास स्थलों का इतिहास, पुरातत्व, पांडुलिपियों और लोकस्मृति के साक्ष्यों के आधार पर गहन सर्वेक्षण कर रहे हैं, ताकि उन पवित्र स्थानों को 'शांकर ज्योति-स्थल' के रूप में चिह्नित किया जा सके।

गोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने ऐतिहासिक संदर्भों को विस्तार देते हुए कहा कि मेवाड़ के प्राचीन इतिहास में राशि और रावल परंपरा का प्रमुख स्थान रहा है। उन्होंने देवालय प्रतिष्ठा शिलालेखों में उत्कीर्ण 'आम्नाय' शब्द सहित एकलिंग पुराण, देवीपुराण और वायु पुराण के साक्ष्यों के आधार पर 8वीं-9वीं शताब्दी में मेवाड़ में जगद्गुरु शंकराचार्य के व्यापक प्रभाव को रेखांकित किया। विशिष्ट अतिथि शांतिपीठ के अनन्तगणेश त्रिवेदी ने अमरखजी सहित क्षेत्र के कई प्राचीन शैव मंदिरों की प्रतिष्ठा पद्धति में शंकराचार्य की परंपरा का स्पष्ट प्रभाव स्वीकार किया। संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज शर्मा ने भौगोलिक दृष्टिकोण साझा करते हुए बताया कि दक्षिण से उत्तर या द्वारिका से पुष्कर की यात्रा के दौरान शंकराचार्य का प्रवास तत्कालीन प्राचीन मेवाड़ में अवश्य हुआ होगा, जिसका प्रभाव आज भी यहाँ की जनजातीय व नगरीय समाज-संस्कृति और लोक परंपराओं में दृष्टिगोचर होता है।

इस वैचारिक समागम में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर भगवती प्रसाद सारस्वत ने ऑनलाइन जुड़कर आगामी शंकराचार्य जयंती पर विश्वविद्यालय में 'जगद्गुरु शंकराचार्य और प्राचीन राजस्थान' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से शंकरभारती महास्वामी का भावभीना अभिनंदन किया गया और डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने उन्हें 'एकलिंगपुराण' की प्रति भेंट की। गोष्ठी का सफल संयोजन सहायक आचार्य डॉ. मुरलीधर पालीवाल ने किया, जबकि वेदांत भारती के श्रीधर हेगडे ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। यह आयोजन न केवल मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की नई परतें खोलता है, बल्कि आदि शंकराचार्य के दार्शनिक पदचिह्नों को राजस्थान की माटी में पुनर्जीवित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

Pratahkal HQ

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