खेरवाड़ा। राजस्थान की धरा पर भक्ति और शक्ति का अनूठा संगम उस समय देखने को मिला जब मकर संक्रांति के पावन पर्व पर राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद द्वारा खेरवाड़ा स्थित श्री हरिओम जनजाति छात्रावास में एक विशाल भजन संध्या का आयोजन किया गया। भक्ति के इस सागर में केवल सुर और ताल ही नहीं गूंजे, बल्कि राष्ट्रवाद और सामाजिक एकता की एक ऐसी लहर उठी जिसने समूचे क्षेत्र को झंकृत कर दिया। संतों के सान्निध्य और हज़ारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक दिव्य स्वरूप प्रदान किया।

भजन संध्या का शुभारंभ आध्यात्मिक गुरुओं के मंगल प्रवेश के साथ हुआ। इस गरिमामयी शाम को जयपुर के श्री रंग अवधुत आश्रम से पधारे महंत स्वामी बसंत आनंद सरस्वती, गुजरात के लसुड़िया धाम के गादीपति विक्रम दास महाराज, पोगरा धुणी के मगन महाराज, खारा धुणा टीडी के नाथु महाराज और बाबा रामदेव मंदिर संकलाल के विश्राम महाराज का विशेष सान्निध्य प्राप्त हुआ। संतों की उपस्थिति ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। मंच पर प्रदेश संगठन मंत्री जगदीश कुलमी, प्रदेश सह संगठन मंत्री हर रतन डामोर, पूर्व विधायक नानालाल अहारी और जिला अध्यक्ष कांतिलाल खराड़ी जैसे गणमान्य व्यक्तित्व विराजमान रहे, जिन्होंने कार्यक्रम की महत्ता को रेखांकित किया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए जयपुर से आए स्वामी बसंत आनंद सरस्वती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आगामी 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 'पंच परिवर्तन' के विषयों पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने समाज में समरसता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर बल देते हुए राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका को स्पष्ट किया। इसी क्रम में समाजसेवी नानालाल जी ने भक्ति गीतों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों, विशेषकर भक्तों, मेटों और कोतवालों से आह्वान किया कि वे अपनी ऊर्जा को संगठित कर एक नई ताकत के साथ समाज हित में कार्य करें।

संगीत की इस सुरमयी महफिल में राजस्थान और सीमावर्ती क्षेत्रों की प्रसिद्ध भजन मंडलियों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। सागवाड़ा, पाल पादेडी, भूधर, थापडावली, महुवाडा, कागदर, ढीकवास, मगरा, भाखरा, काटवास, बावलवाडा, सारोली, भाणदा, उखेड़ी, कनबई, संकलाल, बायडी, पोगरा, बडला, सुन्दरा, झांझरी, सुवेरी, डेरी, खोकादरा, थाबावाडा, मोथली, काकरादरा, देवपुरा, पाणडली और सातसागडा जैसी अनेक जगहों से आए गायकों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां देकर पूरी रात समां बांधे रखा। इस भव्य आयोजन ने न केवल वनवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का काम किया, बल्कि मकर संक्रांति के पर्व पर एकता और सद्भाव का एक सशक्त संदेश भी प्रसारित किया, जो आने वाले लंबे समय तक क्षेत्र में चर्चा का विषय बना रहेगा।

Pratahkal Bureau

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