उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के बप्पा रावल अतिथि सभागार में जनजातीय गौरव वर्ष के उपलक्ष्य में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का बुधवार को भव्य समापन हुआ। ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति : जनजातीय जीवन एवं भारतीय संस्कृति के विशेष संदर्भ में’ विषय पर केंद्रित इस संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, माणिक्यलाल वर्मा आदिवासी शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर तथा ट्राइबल रिसर्च एंड नॉलेज सेंटर, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

समापन सत्र के मुख्य अतिथि टी.सी. डामोर ने अपने उद्बोधन में कहा कि जनजातीय समाज को समझने के लिए केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि धरातलीय समझ की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस समाज से जुड़े हैं, उन पर यह जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे इस परंपरा, जीवनशैली और संस्कृति को जमीनी स्तर से समझें और उसका संरक्षण करें।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने भगवान बिरसा मुंडा, सरदार पटेल और वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए कहा कि आज आदिवासी समाज इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि देश की जीवंत धारा में सक्रिय रूप से उपस्थित है। विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अकादमिक शिक्षा में जनजातीय विषयों को शामिल करना समय की आवश्यकता है, जिससे नई पीढ़ी जनजातीय ज्ञान परंपरा और जीवन दर्शन से जुड़ सके।

संगोष्ठी संयोजक और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन नंदवाना ने कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए आभार ज्ञापित किया। डॉ. नीतू परिहार ने स्वागत उद्बोधन दिया जबकि संचालन डॉ. प्रियंका रावल ने किया।

तकनीकी सत्रों में विभिन्न विद्वानों ने जनजातीय साहित्य, संस्कृति और प्रकृति के संबंधों पर अपने विचार रखे। प्रथम सत्र की अध्यक्षता विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के प्रो. शैलेन्द्र शर्मा ने की, जिन्होंने जनजातीय साहित्य की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. रजनी पी. रावत ने कहा कि जनजातीय समुदाय विश्व को अपना कुटुंब मानता है, वहीं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली के सलाहकार प्रकाश सिंह उइके ने बताया कि प्राचीन काल में वन ही शिक्षा के केंद्र थे, इसलिए वनवासियों के पास प्रकृति से जुड़ा गहन ज्ञान और विज्ञान विद्यमान है।

गुजरात से आई डॉ. प्रेम प्यारी तडवी ने कहा कि प्रकृति का वाहक जनजातीय समुदाय है, जबकि विश्वविद्यालय के सह आचार्य डॉ. आशीष सिसोदिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि जंगलों की रक्षा के लिए जनजातीय समाज ने अपने प्राणों की आहुति तक दी है। अंतिम तकनीकी सत्र में ‘लोक जीवन, लोक कलाओं और लोक साहित्य में प्रकृति’ विषय पर विचार-विमर्श हुआ, जिसमें डॉ. पीयासी दत्ता, डॉ. नीता त्रिवेदी, जनजातीय आयुक्त डॉ. ओमप्रकाश जैन और दिल्ली आईआईटी के प्रो. विवेक कुमार ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम के अंत में विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि भारतीय संस्कृति की जड़ें जनजातीय जीवन और प्रकृति के अटूट संबंध में निहित हैं। संगोष्ठी ने इस गहरे संबंध को पुनर्स्मरण और पुनर्स्थापन का एक सशक्त मंच प्रदान किया।

Pratahkal Bureau

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