Gold import duty India : भारत में सोना महज़ एक पीली धातु नहीं है, बल्कि यह सदियों से भारतीय समाज की सांस्कृतिक आत्मा, धार्मिक आस्था और भावनात्मक जुड़ाव का एक अहम हिस्सा रहा है। शादियों की चमक से लेकर त्योहारों की रौनक तक, हर शुभ कार्य सोने के बिना अधूरा माना जाता है। लेकिन मध्य पूर्व में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील ने पूरे देश में हलचल मचा दी है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती देने के लिए एक साल तक सोना न खरीदने का आग्रह किया है। इस अप्रत्याशित अपील के बाद अब देश भर के बाजारों और आम जनता के बीच एक ही बड़ा सवाल गूंज रहा है कि क्या भारत सरकार सच में सोने की खरीद पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है।

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें सरकार के कानूनी और तकनीकी अधिकारों को समझना होगा। तकनीकी और संवैधानिक रूप से भारत सरकार के पास देश में किसी भी वस्तु के आयात, व्यापार और वित्तीय लेन-देन को नियंत्रित करने या उस पर सख्त नियम लागू करने का पूर्ण अधिकार सुरक्षित है। भारतीय इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सरकार ने अतीत में सोने के स्वामित्व पर कड़ा प्रहार किया था। साल 1968 में लागू किया गया 'गोल्ड कंट्रोल एक्ट' इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों द्वारा घरों में निजी तौर पर सोना जमा करने की प्रवृत्ति पर लगाम कसना और देश में सोने के भारी आयात को रोकना था। हालांकि, 1990 के दशक में देश में आए ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण के दौर में इस कठोर कानून को निरस्त कर दिया गया था। आज के समय में, सरकार पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय रेगुलेटरी रिस्ट्रिक्शंस और सख्त टैक्सेशन नीतियों के जरिए इस बाजार की नब्ज को नियंत्रित करती है।

मौजूदा परिदृश्य में सरकार ने सोने के आयात और खरीद-फरोख्त पर पहले से ही एक मजबूत कानूनी शिकंजा कस दिया है। हाल के वर्षों में सरकार ने सोने के आभूषणों के आयात को मुक्त श्रेणी से हटाकर पूरी तरह से प्रतिबंधित श्रेणी में डाल दिया है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि अब आयातकों को विदेश से सोने की खेप मंगाने के लिए सरकार से विशेष आधिकारिक लाइसेंस लेना अनिवार्य है। इसके साथ ही, बाजार में पारदर्शिता लाने और धोखाधड़ी को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने हॉलमार्क यूनिक आइडेंटिफिकेशन (एचयूआईडी) प्रणाली को पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया है। अब सोने के हर आभूषण पर छह अंकों का एक विशेष अल्फ़ान्यूमेरिक कोड दर्ज होता है, जिससे बिना हॉलमार्क वाले सोने की बिक्री लगभग असंभव हो गई है। काले धन पर प्रहार करने और वित्तीय निगरानी तंत्र को अभेद्य बनाने के लिए नकद खरीद पर भी सख्त सीमाएं तय की गई हैं। वर्तमान नियमों के तहत दो लाख रुपये से अधिक के नकद लेन-देन पर पैन कार्ड अनिवार्य है, और दस लाख से अधिक की खरीद पर आयकर विभाग पैसों के स्रोत की गहन जांच कर सकता है।

जहां तक पूर्ण प्रतिबंध की बात है, तो देश के सांस्कृतिक ढांचे को देखते हुए सोने की खरीद पर पूरी तरह से रोक लगने की संभावना फिलहाल बेहद कम है। लेकिन आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति में सरकार अपने कदम और सख्त कर सकती है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है, जिसका सीधा और भारी असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। आयात के कारण डॉलर का आउटफ्लो बढ़ता है और देश का व्यापार घाटा एक खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। यदि वैश्विक हालात और बिगड़ते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव असहनीय हो जाता है, तो सरकार पूर्ण प्रतिबंध के बजाय आयात शुल्क में भारी वृद्धि कर सकती है, लाइसेंसिंग नियमों को और जटिल बना सकती है या बड़े लेन-देन पर अघोषित रोक लगा सकती है। अंततः, देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए सरकार हर वह मुमकिन कदम उठाएगी जो राष्ट्रीय हित में जरूरी हो, भले ही इसके लिए लोगों को कुछ समय के लिए सोने की चमक से दूर क्यों न रहना पड़े।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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