DU में आधी रात क्या हुआ ऐसा?UGC के नए नियमों ने छात्रों को आपस में भिड़ा दिया, पुलिस थाने तक पहुँची मारपीट - क्या है पूरा मामला?
दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में UGC के नए जातिगत भेदभाव नियमों के विरोध में हिंसक झड़प। मौरिस नगर थाने में हंगामा, छात्र गुटों के बीच मारपीट और पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

15 फरवरी 2026, नई दिल्ली:
देश की राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) का नॉर्थ कैंपस एक बार फिर अखाड़े में तब्दील हो गया है। 14 और 15 फरवरी की दरमियानी रात जो शुरू हुआ, वह महज एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि विचारधाराओं, जातिगत अस्मिता और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाने वाली एक हिंसक घटना बन गई। विश्वविद्यालय की शांति अब नारों और आरोपों के शोर में दब गई है।
विवाद की जड़: UGC के नए नियम
हंगामे की शुरुआत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उन नए नियमों के विरोध से हुई, जिनमें कथित तौर पर जातिगत भेदभाव की शिकायतों को विशिष्ट समूहों तक सीमित करने की बात कही गई है। छात्र संगठन 'AISA' और अन्य वामपंथी समूहों का तर्क है कि ये नए नियम भेदभाव के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करेंगे और कैंपस में एक बड़े वर्ग को असुरक्षित बना देंगे। इसी के विरोध में छात्र नॉर्थ कैंपस में रात के समय प्रदर्शन कर रहे थे।
आधी रात को हिंसा और मारपीट
रात के सन्नाटे में शुरू हुआ यह प्रदर्शन तब हिंसक हो गया जब वहां अलग-अलग छात्र गुटों के बीच कहासुनी शुरू हुई। पत्रकार रुचि तिवारी ने दावा किया कि जब वह घटना को कवर कर रही थीं, तब AISA से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने उन पर हमला किया और उनके साथ बदसलूकी की।
दूसरी ओर, AISA ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि रुचि तिवारी और ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के समर्थकों ने मिलकर उनके सदस्यों, विशेषकर महिला छात्रों पर हमला किया। यह विवाद देखते ही देखते शारीरिक हिंसा में बदल गया, जिससे कैंपस में दहशत का माहौल बन गया।
मौरिस नगर थाना: जहाँ कानून के सामने ही हुआ 'हंगामा'
हिंसा के बाद जब छात्र अपनी शिकायतें दर्ज कराने मौरिस नगर थाने पहुँचे, तो स्थिति और भी विस्फोटक हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के अनुसार, ABVP के समर्थक जबरन थाने के भीतर घुस आए। आरोप है कि पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में ही वहां प्रदर्शनकारी छात्रों, विशेषकर अंजलि शर्मा और नेहा नाम की छात्राओं के साथ गाली-गलौज की गई और उन्हें डराया-धमकाया गया।
वीडियो में कथित तौर पर देखा जा सकता है कि पुलिस अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जबकि थाने के भीतर ही छात्र गुट एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं और नारेबाज़ी कर रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि पुलिस का रवैया एकतरफा रहा और उन्होंने हमलावरों को रोकने के बजाय पीड़ितों को ही चुप कराने की कोशिश की।
पुलिस की कार्रवाई और वर्तमान स्थिति
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दोनों पक्षों की शिकायतों के आधार पर FIR दर्ज कर ली है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, "हम स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं। थाने और कैंपस के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं ताकि हमलावरों की पहचान की जा सके। अभी तक इस मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।"
पुलिस की इस 'धीमी' कार्रवाई ने छात्रों के गुस्से को और भड़का दिया है। कैंपस में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और वज्र वाहनों की तैनाती की गई है, लेकिन तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है।
कैंपस में जातिगत विभाजन और सुरक्षा पर सवाल
यह घटना केवल दो छात्र गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह कैंपस के भीतर गहरे होते जातिगत और वैचारिक विभाजन को भी दर्शाती है। छात्रों का एक बड़ा वर्ग डरा हुआ है। एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "यूनिवर्सिटी पढ़ाई के लिए है, लेकिन अब यहाँ डर का माहौल है। अगर थाने के भीतर भी लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं, तो हम कैंपस में कैसे सुरक्षित महसूस करेंगे?"
मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो, यह घटना शिक्षा के मंदिर में बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा करती है। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब तर्क की जगह लाठियां और गालियां ले लेती हैं, तो वह समाज और भविष्य के नेतृत्व—यानी छात्रों—के लिए खतरनाक संकेत है।
समाधान की ज़रूरत
15 फरवरी 2026 की यह घटना दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में एक और काला अध्याय जोड़ गई है। जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस निष्पक्ष होकर दोषियों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाते, तब तक कैंपस में शांति की बहाली मुश्किल है। शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ सुरक्षित माहौल का अधिकार भी छात्रों के लिए उतना ही ज़रूरी है।

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