मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में दशहरा मनाने की एक ऐसी अनूठी और हैरान करने वाली परंपरा निभाई जाती है, जो देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है। आमतौर पर जहां पूरे देश में विजयादशमी के पावन पर्व पर रावण के बड़े-बड़े पुतलों का दहन किया जाता है, वहीं विदिशा की लटेरी तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम कालादेव में रावण का वध आग से नहीं बल्कि पत्थरों की एक रोमांचक जंग के जरिए किया जाता है। हर साल दशहरे के मौके पर इस गांव में होने वाले इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए दूर-दूर से भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

इस पारंपरिक और ऐतिहासिक आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां रावण की एक विशाल स्थायी प्रतिमा स्थापित है, जिसके सामने राम दल और रावण की सेना के बीच एक प्रतीकात्मक युद्ध लड़ा जाता है। इस युद्ध के दौरान रावण की सेना की भूमिका निभाने वाली टोली राम दल के ऊपर गोफन यानी पत्थर फेंकने वाले एक प्राचीन हथियार की मदद से ताबड़तोड़ पत्थरों की बरसात करती है। सबसे हैरानी और आश्चर्य की बात यह है कि इतनी भारी मात्रा में बरसाए जाने वाले ये पत्थर किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार का नुकसान या खरोंच तक नहीं पहुंचाते हैं।

ग्रामीणों और इस पुरानी परंपरा को करीब से जानने वालों के अनुसार, इस अनोखे युद्ध में रावण की सेना का प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से आसपास के आदिवासी और बंजारा समाज के लोग करते हैं। ये सभी लोग गोफन चलाने में इतने अधिक माहिर और दक्ष होते हैं कि उनका निशाना बंदूक से भी ज्यादा सटीक माना जाता है। इस खास आयोजन की शुरुआत से ठीक पहले रावण की प्रतिमा के पास पत्थरों का एक बड़ा ढेर लगा दिया जाता है। जैसे ही राम दल के लोग आगे बढ़कर मैदान में गाड़े गए विजय प्रतीक ध्वज को छूने की कोशिश करते हैं, वैसे ही दूसरी ओर से रावण सेना की तरफ से पत्थरों की तेज बौछार शुरू कर दी जाती है।

स्थानीय मान्यताओं और वहां मौजूद लोगों के अनुभवों के अनुसार, अच्छे-अच्छे और मंजे हुए निशानेबाजों के वार भी इस दौरान बिल्कुल बेअसर साबित होते हैं और गोफन से तेजी से निकले हुए पत्थर हवा में अपनी दिशा बदलकर सुरक्षित निकल जाते हैं। मध्य प्रदेश के इस आंचल में चली आ रही इस अनोखी परंपरा की शुरुआत कब और किन परिस्थितियों में हुई थी, इसको लेकर कोई भी पुख्ता ऐतिहासिक या लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, गांव के बुजुर्गों का ऐसा मानना है कि यह एक सदियों पुरानी प्रथा चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी शिद्दत से निभाया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सबसे बड़ा रहस्य और हैरानी का विषय यह रहता है कि पत्थरों की इतनी भयंकर और भारी बौछार होने के बावजूद राम दल में शामिल किसी भी व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आती और न ही कोई घायल होता है। यह प्रतीकात्मक युद्ध और मंदिर की परिक्रमा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब अंत में राम दल को आधिकारिक रूप से विजयी घोषित किया जाता है, तो वहां मौजूद हजारों की संख्या में ग्रामीण जश्न मनाते हैं। इस अनूठे आयोजन को लेकर लोगों के मन में गहरी आस्था जुड़ी हुई है, जहां कुछ लोग इसे अपनी स्थानीय संस्कृति और लोक परंपरा का अनमोल हिस्सा मानते हैं, वहीं कई इसे इस परंपरा का एक जादुई रूप भी करार देते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story