राजनयिक वार्ता में ईरान के यूरेनियम संवर्धन को रोकने और परमाणु ठिकानों के अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण सहित चार मुख्य बिंदुओं पर सहमति बनने का दावा।

तेहरान/वाशिंगटन: वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी घटनाक्रम के तहत अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध को समाप्त करने के लिए एक विस्तृत शांति समझौते की रूपरेखा तैयार होने का दावा किया गया है। अमेरिकी और ईरानी राजनयिकों के बीच बंद कमरों में हुई सघन वार्ता के बाद एक ऐसी सहमति उभरकर सामने आई है, जो मध्य पूर्व सहित पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा मंगलवार को जारी की गई एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम से जुड़े सबसे विवादित और संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बन गई है। इस समझौते का मुख्य केंद्र बिंदु ईरान का अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम भंडार और उसके परमाणु स्थलों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी प्रणाली है, जिसे लेकर वाशिंगटन और तेहरान के बीच वर्षों से गंभीर सैन्य और आर्थिक टकराव की स्थिति बनी हुई थी।

राजनयिक सूत्रों के अनुसार, यह संभावित शांति समझौता मुख्य रूप से चार रणनीतिक बिंदुओं पर केंद्रित है, जिन पर दोनों पक्षों ने व्यापक विचार-विमर्श किया है। समझौते के पहले और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु के तहत ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को एक लंबी अवधि के लिए पूरी तरह से रोकने का प्रावधान किया गया है। दूसरे बिंदु में ईरान के पास वर्तमान में मौजूद संवर्धित यूरेनियम भंडार को धीरे-धीरे कम करने और उसे डायल्यूट (कम क्षमता का) करने की कार्ययोजना शामिल है। तीसरे बिंदु के तहत वाशिंगटन ने ईरान के मुख्य परमाणु ठिकानों को पूरी तरह खत्म करने या उन्हें निष्क्रिय करने की मांग रखी है। अंतिम और चौथा बिंदु बेहद संवेदनशील है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय परमाणु निगरानी संस्थाओं को ईरानी परमाणु स्थलों का बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक और त्वरित निरीक्षण (स्नैप इंस्पेक्शन) करने का वैधानिक अधिकार देने की बात कही गई है।

इस समझौते का सबसे दिलचस्प और पेंच फंसाने वाला पहलू यूरेनियम के भौतिक स्थानांतरण से जुड़ा हुआ है। शुरुआती दौर में अमेरिका की सख्त मांग थी कि ईरान अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक को देश की भौगोलिक सीमाओं से बाहर किसी अन्य सुरक्षित देश में भेजे, लेकिन ईरानी नेतृत्व ने इस मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया। नई सहमति के तहत अब अमेरिका इस यूरेनियम को ईरान से बाहर भेजने के लिए दबाव नहीं बनाएगा, बल्कि इसके भंडार को नियंत्रित और कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ मिलकर काम करने पर राजी हो गया है। उल्लेखनीय है कि आईएईए के अनुमानों के मुताबिक ईरान के पास करीब साठ प्रतिशत तक संवर्धित चार सौ चालीस किलोग्राम यूरेनियम का भंडार मौजूद था, हालांकि जून 2025 में हुए अमेरिकी हवाई हमलों से इस भंडार को कितना नुकसान पहुंचा था, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है।

परमाणु ठिकानों और निरीक्षण की कानूनी व व्यावहारिक पेचीदगियां इस समझौते की राह में सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान नतान्ज, फोर्डो और इस्फहान में स्थित अपने तीन सबसे बड़े परमाणु ठिकानों को हमेशा के लिए बंद कर दे। ईरान ने इस दिशा में आंशिक रूप से सहमति जताते हुए तीन में से दो ठिकानों को बंद करने और एक रणनीतिक ठिकाने को चालू रखने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा, अचानक निरीक्षण की अनुमति देने पर भी संशय बरकरार है, क्योंकि ईरान के कई महत्वपूर्ण परमाणु केंद्र उसकी संभ्रांत सेना 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) के अत्यंत सुरक्षित सैन्य परिसरों के भीतर स्थित हैं, जहां इतिहास में कभी भी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को पैर रखने की इजाजत नहीं दी गई है। इसके साथ ही, यूरेनियम संवर्धन को रोकने की समयावधि पर भी मतभेद हैं; जहां अमेरिका बीस साल की रोक चाहता है, वहीं ईरान दस साल का प्रस्ताव दे रहा है, और मध्यस्थों को उम्मीद है कि बात पंद्रह साल की अवधि पर आकर तय हो जाएगी।

इस वैश्विक महाडील का भविष्य अभी भी पूरी तरह से अनिश्चितताओं के भंवर में फंसा हुआ है, विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कड़े रुख को देखते हुए। डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वे बीस साल की न्यूनतम अवधि से कम के किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे, ऐसे में इस चार सूत्रीय सहमति पर उनकी अंतिम मुहर लगना बाकी है। इसके अतिरिक्त, हालिया दिनों में इजरायल द्वारा लेबनान में किए गए भीषण हमलों और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रैट ऑफ होर्मुज) के आसपास अमेरिकी व ईरानी नौसेनाओं के बीच हुई सैन्य झड़पों का इस पूरी वार्ता पर क्या असर पड़ेगा, यह साफ नहीं है। ईरान द्वारा आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देने और उसकी विदेशों में फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी करने की मांग पर भी अमेरिकी प्रशासन ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, जो इस समझौते के भविष्य को और अधिक रहस्यमयी बनाता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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