सगे-संबंधियों का 'पारिवारिक पैकेज': नियम ताक पर रखकर मदरसों में रची गई चहेतों की भर्ती की बड़ी साजिश|
उत्तर प्रदेश के अनुदानित मदरसों में प्रबंधकों द्वारा नियमों के विरुद्ध अपने ही रिश्तेदारों और पांच-समय दामादों को सरकारी नौकरी देने का मामला सामने आया।

उत्तर प्रदेश के अनुदानित मदरसों में नियमों के विरुद्ध की गई नियुक्तियों की फाइलें खंगालते जांच अधिकारी। यह चित्र विवरणात्मक उद्देश्यों के लिए निर्मित किया गया है।
उत्तर प्रदेश के सरकारी सहायता प्राप्त (अनुदानित) मदरसों में नियमों को ताक पर रखकर की गई अवैध नियुक्तियों और वित्तीय अनियमितताओं का एक बड़ा मामला सामने आया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के कड़े हस्तक्षेप के बाद शुरू हुई प्रशासनिक जांच में भ्रष्टाचार की ऐसी परतें खुली हैं, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र को अचंभित कर दिया है। जांच के शुरुआती दायरे में ही यह साफ हो गया है कि कई मदरसा प्रबंधकों और प्रधानाचार्यों ने सरकारी धन का दुरुपयोग करते हुए अपने ही सगे-संबंधियों, बेटों, पत्नियों और यहां तक कि कई-कई दामादों को सरकारी शिक्षक और कर्मचारी के पदों पर अवैध रूप से आसीन कर दिया।
इस पूरे फर्जीवाड़े का पर्दाफाश तब हुआ जब सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर मोहम्मद तल्हा अंसारी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राज्य के अनुदानित मदरसों को मिलने वाले सरकारी फंड और शिक्षकों की नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है। आयोग ने इस शिकायत को बेहद गंभीरता से लिया और इसे सीधे तौर पर मानवाधिकारों के हनन और पारदर्शिता के उल्लंघन से जुड़ा मामला मानते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दिया। आयोग के कड़े रुख और जांच के आदेश के बाद अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के अधिकारियों ने राज्य के विभिन्न जिलों में नियुक्तियों के रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए, जिसके बाद गड़बड़ियों की पूरी सूची सामने आने लगी।
सरकारी सेवा नियमावली के अनुसार, कोई भी मदरसा प्रबंधक या प्रधानाचार्य अपने कार्यकाल के दौरान अपने किसी भी निकट संबंधी की नियुक्ति संस्था में नहीं कर सकता है। इस विधिक अड़चन से बचने के लिए प्रबंधकों ने एक बेहद शातिराना तरीका अपनाया। जब भी किसी रिश्तेदार को नौकरी पर रखना होता था, तो प्रबंधक अपने पद से औपचारिक इस्तीफा दे देता था। इसके बाद कार्यवाहक समिति के जरिए चहेते रिश्तेदार की नियुक्ति की जाती थी और भर्ती प्रक्रिया पूरी होते ही पूर्व प्रबंधक दोबारा अपने पद पर काबिज हो जाता था। इस तरह कानून की आंखों में धूल झोंककर अपनों को सरकारी वेतनमान वाली नौकरियां बांटी गईं।
जांच में सामने आए जिलेवार आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि किस प्रकार एक-एक मदरसे पर पूरे परिवार का नियंत्रण स्थापित हो चुका था। जौनपुर के मछलीशहर स्थित रियाजुल उलूम मदरसे का उदाहरण सबसे चौंकाने वाला है। यहां बकरिदुल खान उर्फ इमरान वर्तमान में सरकारी शिक्षक हैं, जो पूर्व में इसी मदरसे के प्रबंधक रह चुके हैं। उनकी पत्नी महजबी बेगम इसी मदरसे में सरकारी प्रधानाचार्य के पद पर तैनात हैं, जबकि उनके दो बेटे, फैजान अहमद और रिजवान अहमद भी इसी संस्थान में सरकारी शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। इतना ही नहीं, परिवार के अन्य करीबी रिश्तेदार महमूद आलम यहां सरकारी क्लर्क हैं, जबकि फरहत अंजुम और तहसीन बानो भी मदरसाकर्मी के रूप में सरकारी कोष से वेतन उठा रहे हैं।
इसी तरह का एक और बड़ा मामला बस्ती जिले के कप्तानगंज स्थित अहले सुन्नत फैजुन्नबी मदरसे में देखने को मिला, जहां के प्रबंधक मुनीर अली ने नियमों को दरकिनार करते हुए अपने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे पांच दामादों को सरकारी अध्यापक के पद पर नियुक्त करवा दिया। वहीं जौनपुर के ही अब्रे रहमत मदरसे में प्रबंधक बाबर कुरैशी की बहू अफसू बानो सरकारी क्लर्क के पद पर तैनात पाई गईं। बाराबंकी के अलियाबाद स्थित जमीयतुल फलाह मदरसे में प्रबंधक अफसरी फहीम के दो सगे बेटे, मोहम्मद काशिफ उमैर और मोहम्मद आमिर, सरकारी शिक्षक के पदों पर काम कर रहे हैं। जिले के ही रसौली स्थित जामिया मदीनतुल उलूम मदरसे के प्रबंधक अयाज अहमद ने अपनी पत्नी जेबा बानो और साले मोहम्मद शब्बीर को सरकारी शिक्षक के पद पर नियुक्त कर रखा है।
कानूनी और आधिकारिक पहलू की बात करें तो उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इन सभी संदिग्ध नियुक्तियों की विस्तृत स्क्रूटनी की जा रही है। जांच अधिकारियों का कहना है कि विज्ञापन जारी करने से लेकर चयन समिति के गठन और नियुक्तियों की अंतिम स्वीकृति तक के सभी दस्तावेजों की फॉरेंसिक और प्रशासनिक जांच जारी है। प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने वाले प्रबंधकों के खिलाफ जालसाजी और सरकारी धन के गबन का मुकदमा दर्ज करने की तैयारी की जा रही है। इस जांच के दूरगामी प्रभाव होंगे, क्योंकि इसके आधार पर राज्य के सभी अनुदानित मदरसों में भर्ती नियमों को कड़ा किया जाएगा और अपात्रों की सेवाएं समाप्त कर सरकारी खजाने की रिकवरी की जाएगी।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
