भारतीय रेलवे के इतिहास और देश के जंगलों के संरक्षण में 'वनटांगिया' समुदाय का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। औपनिवेशिक काल के दौरान जब भारत में तेजी से रेल नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा था, तब पटरियों को मजबूती देने वाले लकड़ी के स्लीपरों की भारी मांग को पूरा करने के लिए इस समुदाय ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों की नजर उत्तर प्रदेश के देवड़ी, नैनीताल, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बलरामपुर, महाराजगंज और गोरखपुर जैसे क्षेत्रों के जंगलों पर विशेष रूप से थी। इस समुदाय के लोग जंगलों में ही जीवन बिताते हुए साखू के विशाल जंगलों को विकसित करने और उनकी देखभाल करने के कार्य में जुटे रहे।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, 'टांगिया' शब्द म्यांमार से आया है, जहां वन प्रबंधन की विशेष ट्रेनिंग लेने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने सबसे पहले वर्ष 1925-26 में बहराइच के मोतीपुर वन रेंज में टांगिया पद्धति के माध्यम से पौधारोपण का कार्य शुरू किया था। 'वानटांगिया' नाम हिंदी के 'वन' और 'टांगिया' (कुल्हाड़ी) शब्दों से मिलकर बना है, जो वानिकी कार्यों से उनकी गहरी और ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाता है। इस व्यवस्था के तहत, साखू के पेड़ों की खेती के लिए एक खास तकनीक अपनाई जाती थी, जिसे 'झूम खेती' या 'शिफ्टिंग कल्टीवेशन' भी कहा जाता है। साखू के पेड़ की यह विशेषता होती है कि इसका बीज गिरने पर यदि समय पर गहराई से न बोया जाए, तो वह उग नहीं पाता है, जिसके लिए विशेष देखरेख की आवश्यकता होती थी।

उस दौर में रेलवे लाइन बिछाने के लिए बड़े पैमाने पर साखू के पेड़ों को काटा जाता था, क्योंकि एक किलोमीटर लंबी रेल लाइन और उसकी मजबूती के लिए लगभग साठ साखू के पेड़ों की लकड़ी की आवश्यकता पड़ती थी। इस कार्य को गति देने के लिए वनटांगिया मजदूरों को जंगलों में खाली जमीन दी जाती थी, जिसे वे साफ कर खेती के योग्य बनाते थे। एक निश्चित दूरी पर कतारों में पौधे लगाए जाते थे और पौधों के बीच की खाली जमीन पर वे अपनी फसल उगाकर जीवनयापन करते थे। वन विभाग कुल पैदावार का आधा हिस्सा अपने पास रखता था, जबकि शेष आधे हिस्से पर इन मजदूरों का गुजारा होता था। पांचवें वर्ष में जब पेड़ बड़े होने लगते थे, तो उन्हें प्रक्रिया किसी अन्य खाली जमीन पर दोहरानी पड़ती थी, जिसके लिए कई मजदूर जंगलों में ही बस्तियां बनाकर रहते थे।

ऐतिहासिक रूप से इस समुदाय को लंबे समय तक सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके गांवों को 'वन ग्राम' का दर्जा प्राप्त था, जिसके कारण वे उन मूलभूत सरकारी योजनाओं और राजस्व गांवों को मिलने वाले अधिकारों से वंचित रह गए, जिससे वे गरीबी के चक्र में फंसे रहे। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, गोंडा और बहराइच जैसे जिलों में इनकी उपस्थिति है, जबकि कुछ आबादी असम और उत्तराखंड में भी निवास करती है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा इन समुदायों के कई गांवों को आधिकारिक रूप से 'राजस्व गांव' का दर्जा दिए जाने से उनके जीवन स्तर में सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं। हालांकि, अपनी विशिष्ट आदिवासी विरासत और हिंदी व स्थानीय बोलियों को अपनाने के बावजूद, अधिकांश राज्यों में इन्हें अनुसूचित जनजाति का आधिकारिक दर्जा मिलने का इंतजार है। यह समुदाय आज भी अपनी मेहनत और देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण में दिए गए ऐतिहासिक योगदान के लिए विशेष सम्मान का हकदार है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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