प्रदूषण से फर्टिलाइजर: एक तीर से कई निशाने, भारत की बदल जाएगी तकदीर

संकट में अवसर: ईरान युद्ध और भारत की रणनीति

दुनिया इस समय ईरान युद्ध और उसके कारण बाधित हुई गैस व कच्चे तेल की सप्लाई से चिंतित है। भारत के लिए यह न केवल कुकिंग गैस बल्कि फर्टिलाइजर बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली एलएनजी (LNG) की कमी का भी संकट है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञ स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर के अनुसार, यह 'आफत' हमारे लिए एक बड़ा 'अवसर' बनकर आई है।

भारत वर्तमान में फर्टिलाइजर के लिए भारी मात्रा में आयात और सरकारी सब्सिडी पर निर्भर है। जहाँ नए फर्टिलाइजर प्लांट लगाने में दशकों और अरबों की पूंजी लगती है, वहीं एक ऐसा समाधान हमारे पास मौजूद है जिसे अब तक नज़रअंदाज़ किया गया—वह है हमारा वायु प्रदूषण।

ज़हरीली हवा में छिपा है 'कच्चा माल'

भारत के शहरों की हवा में मौजूद PM2.5 कण स्वास्थ्य के लिए काल हैं, जो दिल और सांस की बीमारियों का कारण बनते हैं। लेकिन विज्ञान की नज़र से देखें तो इस प्रदूषित हवा में नाइट्रोजन और सल्फर की भारी मात्रा मौजूद है।

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक स्टडी के अनुसार, भारत के PM2.5 प्रदूषण में 'सेकेंडरी पार्टिकल्स' का योगदान लगभग एक-तिहाई है। ये पार्टिकल्स हवा में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट बनाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले फर्टिलाइजर्स (उर्वरक) हैं।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम? (The Process)

इस क्रांतिकारी विचार को धरातल पर उतारने के लिए दो चरणों वाली प्रक्रिया की आवश्यकता होगी:

  • प्रथम चरण: औद्योगिक फिल्ट्रेशन सिस्टम के जरिए हवा से PM2.5 से बड़े धूल के कणों को अलग करना।
  • द्वितीय चरण: आधुनिक इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर या हाई-एफिशिएंसी फिल्टर का उपयोग करके PM2.5 कणों को छानना।

इस प्रक्रिया से अंत में एक ठोस पोषक तत्व प्राप्त होगा। पारंपरिक खाद बनाने के लिए जहाँ बहुत अधिक ऊर्जा और आयातित गैस की जरूरत होती है, वहीं यह 'फिजिकल फिल्ट्रेशन' तकनीक काफी सस्ती और सरल होगी।

आंकड़ों की ज़ुबानी: कहाँ है सबसे ज़्यादा संभावना?

CREA की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 9 बड़े शहरों में अमोनियम सल्फेट की मात्रा कुल PM2.5 का 40% से भी अधिक है।

  • सबसे प्रदूषित और क्षमता वाले शहर: कोरबा (43.1%), भिलाई (42.5%), अनपरा (42.3%) और रायपुर (42.1%)। इन शहरों में कोयला आधारित उद्योगों के कारण हवा में खाद बनाने की अपार संभावना है।
  • कम प्रदूषण वाले शहर: जोधपुर, श्रीनगर और राजकोट जैसे शहरों में यह मात्रा 20-25% के बीच है।

सब्सिडी के बोझ से मिलेगी मुक्ति

भारत सरकार हर साल किसानों को सस्ता यूरिया देने के लिए लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है। इससे किसान ज़रूरत से ज़्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत खराब हो रही है। हवा से निकाला गया फर्टिलाइजर इतना सस्ता होगा कि इसके लिए सब्सिडी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इससे सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा और किसान संतुलित खाद का उपयोग कर पाएंगे।

विकेंद्रीकृत मॉडल: हर जिले में अपनी 'खाद फैक्ट्री'

इस मॉडल की सबसे बड़ी खूबी इसका 'लोकल' होना है। बड़े प्लांट लगाने के बजाय, हर प्रदूषित जिले में छोटी फिल्ट्रेशन यूनिट्स लगाई जा सकती हैं।

  • ट्रांसपोर्ट का खर्च बचेगा: खाद उसी इलाके में बनेगी जहाँ उसका इस्तेमाल होना है।
  • शहरी प्रदूषण, ग्रामीण विकास: शहरों का धुआं अब गांवों के खेतों को हरा-भरा बनाएगा।


चुनौतियां और भविष्य की राह

बेशक, यह राह इतनी आसान नहीं है। प्रदूषित हवा में मौजूद भारी धातुओं (Heavy Metals) और जहरीले पदार्थों को अलग करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती होगी। साथ ही, अलग-अलग प्रकार की मिट्टी (अम्लीय या क्षारीय) के हिसाब से इस खाद की प्रोसेसिंग करनी पड़ सकती है।


स्वामीनाथन अय्यर का यह सुझाव भले ही आज बेतुका लगे, लेकिन यह भविष्य की जरूरत है। अगर हम पायलट प्रोजेक्ट्स के जरिए इसे सफल बना लेते हैं, तो भारत एक साथ तीन समस्याओं को हल कर लेगा—वायु प्रदूषण से मुक्ति, फर्टिलाइजर में आत्मनिर्भरता और अरबों रुपये की सब्सिडी की बचत।

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