शरद पवार और अजित पवार के बीच अलगाव की वह अनकही दास्तां जिसने बदल दी महाराष्ट्र की किस्मत

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में 'पवार' परिवार का नाम केवल एक उपनाम नहीं, बल्कि शक्ति का सर्वोच्च केंद्र माना जाता रहा है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में शरद पवार और अजित पवार के बीच जो बिखराव हुआ, उसने भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे बड़ा पारिवारिक और राजनीतिक विभाजन दर्ज किया। यह कहानी है 'काका' शरद पवार और 'दादा' अजित पवार के बीच बढ़ती उस खाई की, जिसने न केवल एक परिवार को दो हिस्सों में बांट दिया, बल्कि देश की सबसे मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों में से एक 'राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी' (NCP) का वजूद भी पूरी तरह बदल कर रख दिया।

विभाजन की पटकथा: जब शरद पवार और अजित पवार के बीच पड़ने लगी दरार

शरद पवार और अजित पवार के बीच मतभेदों की शुरुआत रातों-रात नहीं हुई। जानकारों के अनुसार, इसकी जड़ें दशकों पुरानी हैं, लेकिन साल 2019 के बाद ये दरारें सार्वजनिक होने लगीं।

  • 2019 का वह 'भोर' शपथ ग्रहण: नवंबर 2019 में जब पूरा प्रदेश सो रहा था, तब अजित पवार ने अचानक देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि वह सरकार महज 80 घंटे चली, लेकिन इसने शरद पवार के भरोसे को पहली बार बुनियादी तौर पर हिलाकर रख दिया।
  • उत्तराधिकार का प्रश्न: अजित पवार ने पार्टी को जमीनी स्तर पर दशकों तक सींचा था, लेकिन पार्टी के भीतर सुप्रिया सुले की बढ़ती सक्रियता और उन्हें राष्ट्रीय भूमिका मिलने के संकेतों ने अजित पवार को हाशिए पर महसूस कराया। उन्हें लगा कि उनके संघर्ष के बावजूद विरासत की असली चाबी शरद पवार द्वारा सुप्रिया सुले के हाथ में सौंपी जा रही है।
  • विचारधारा बनाम सत्ता: अजित पवार का मानना था कि विपक्ष में बैठने के बजाय सत्ता में रहकर विकास करना जरूरी है, जबकि शरद पवार वैचारिक रूप से भाजपा के खिलाफ 'महा विकास अघाड़ी' (MVA) को मजबूत करने पर अड़े थे।

2 जुलाई 2023: वह दिन जब शरद पवार की NCP दो फाड़ हो गई

अजित पवार के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और कड़ा मोड़ 2 जुलाई 2023 को आया। उन्होंने एक बार फिर सबको चौंकाते हुए राजभवन में एक भव्य समारोह के दौरान एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की सरकार में शामिल होने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।

घटना के प्रमुख पहलू:

  • मंत्रिमंडल में बड़ी सेंध: अजित पवार ने न केवल खुद उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, बल्कि छगन भुजबल और प्रफुल्ल पटेल जैसे शरद पवार के सबसे करीबी दिग्गजों को भी अपने पाले में कर लिया।
  • बगावत का तर्क: अजित पवार ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि उनका निर्णय शरद पवार के खिलाफ कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के साथ जुड़कर प्रदेश का विकास करना है।
  • शरद पवार का पलटवार: शरद पवार ने इस कदम को सार्वजनिक रूप से 'विश्वासघात' बताया और घोषणा की कि वे जनता की अदालत में जाकर अपनी पार्टी को शून्य से दोबारा खड़ा करेंगे।

कानूनी युद्ध और 'असली NCP' का जन्म

पार्टी के बंटवारे के बाद मामला चुनाव आयोग (ECI) और सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंचा। महीनों चली तीखी कानूनी लड़ाई के बाद एक ऐसा फैसला आया जिसने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया:

  • नाम और चुनाव चिन्ह का फैसला: चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर अजित पवार के गुट को ही 'असली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी' माना और उन्हें पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह 'घड़ी' आवंटित कर दिया।
  • शरद पवार का नया अस्तित्व: शरद पवार के हिस्से में एक नया नाम आया—'राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी - शरदचंद्र पवार' और उन्हें नया चुनाव चिन्ह 'तुतारी बजाता हुआ व्यक्ति' मिला।

शरद पवार की विरासत और अजित पवार की नई उड़ान

शरद पवार और अजित पवार का अलग होना केवल एक पार्टी का टूटना नहीं था, बल्कि यह महाराष्ट्र की उस संस्कृति का अंत था जहां 'पवार परिवार' की अभेद्य एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। अजित पवार ने अपनी अलग राह चुनकर अपनी ताकत को साबित किया, लेकिन इस अलगाव ने महाराष्ट्र के मतदाताओं को भी वैचारिक रूप से दो हिस्सों में बांट दिया। आज जब हम इस इतिहास को देखते हैं, तो यह समझ आता है कि सत्ता की राजनीति में रिश्तों की मर्यादा अक्सर महत्वाकांक्षाओं के आगे छोटी पड़ जाती है। यह संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के उस पहलू को उजागर करता है जहां एक अनुभवी गुरु और उसके सबसे शक्तिशाली शिष्य के रास्ते हमेशा के लिए जुदा हो गए।

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