सुप्रीम कोर्ट की DMK को फटकार: 'अदालत को पॉलिटिकल फोरम न बनाएं', जानें क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने सीएम विजय के खिलाफ डीएमके की याचिका खारिज की, कहा- कोर्ट को पॉलिटिकल फोरम न बनाएं।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय और सुप्रीम कोर्ट की इमारत, जो करूर भगदड़ मामले में कानूनी सुनवाई के संदर्भ को दर्शाती है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति सी जोसेफ विजय को करूर भगदड़ मामले से जुड़े एक कानूनी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को बड़ी राहत प्राप्त हुई है। शीर्ष अदालत की वेकेशन बेंच ने इस मामले में द्रमुक (DMK) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली है। यह मामला सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में आयोजित एक रैली के दौरान हुई भगदड़ की घटना से संबंधित है, जिसकी जांच वर्तमान में सीबीआई द्वारा की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में डीएमके की ओर से संगठन सचिव आरएस भारती ने याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि मुख्यमंत्री थलपति सी जोसेफ विजय की सरकार के मंत्री, जो स्वयं भगदड़ कांड में आरोपी भी हैं, कथित तौर पर मामले के गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि मुख्यमंत्री और पार्टी से जुड़े अन्य लोगों को जांच की मेरिट पर सार्वजनिक बयान देने से रोका जाए। वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि मुख्यमंत्री का पीड़ितों के परिवारों से मिलना गवाहों को प्रभावित करने जैसा है, क्योंकि वे सभी गवाह भी हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने डीएमके को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की वेकेशन बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे इस अदालत को पॉलिटिकल फोरम नहीं बनने देंगे। अदालत ने डीएमके से सवाल किया कि क्या वे राज्य के मुख्यमंत्री के भाषणों और उनके दौरों को नियंत्रित करना चाहते हैं। बेंच ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या वे मुख्यमंत्री की फ्री स्पीच (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर रोक लगाना चाहते हैं।
न्यायाधीशों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ऐसे मामले में, जहां जांच के लिए पहले ही सीबीआई को नियुक्त किया जा चुका है, सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक विरोधी की याचिका पर आदेश जारी नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी विशेष रूप से स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री थलपति विजय इस मामले में आरोपी नहीं हैं। इस संवैधानिक और कानूनी स्पष्टता के बाद, डीएमके ने अपनी याचिका वापस लेने का आग्रह किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
इससे पूर्व डीएमके ने अपनी याचिका में जिक्र किया था कि मुख्यमंत्री भगदड़ में जान गंवाने वालों के परिवारों को 20-20 लाख रुपये और घायलों को 2-2 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान कर चुके हैं। हालाँकि, डीएमके का कहना था कि उन्हें पीड़ित कल्याण से समस्या नहीं है, लेकिन जांच प्रक्रिया के दौरान सीएम की सक्रियता गवाहों पर प्रभाव डाल सकती है। अंततः, शीर्ष अदालत के इस रुख ने मुख्यमंत्री थलपति विजय को कानूनी रूप से बड़ी राहत प्रदान की है और राजनीतिक विरोध के चलते अदालती प्रक्रिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है।

Lalita Rajput
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