दो दशक का वनवास खत्म- निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन की दो दशक बाद कोलकाता में वापसी|
नवंबर 2007 में शहर छोड़ने के बाद, लेखिका तस्लीमा नसरीन एक अगस्त को रबींद्र सदन में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी।

लेखिका तस्लीमा नसरीन, जो दो दशक बाद आगामी अगस्त महीने में कोलकाता के एक साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने आ रही हैं।
बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन करीब बीस साल के लंबे अंतराल के बाद अगले महीने कोलकाता लौट रही हैं। उनकी यह वापसी साहित्यिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेखिका एक अगस्त को शहर में आयोजित होने वाले एक कट्टरपंथ-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेंगी। नवंबर 2007 में कोलकाता में उनकी उपस्थिति को लेकर हुए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों और सुरक्षा चिंताओं के कारण उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था, जिसके बाद से ही वे विभिन्न स्थानों पर निर्वासन का जीवन जी रही हैं।
आयोजकों के अनुसार, तस्लीमा नसरीन 31 जुलाई को कोलकाता पहुंचेंगी। रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले इस साहित्यिक कार्यक्रम में लेखिका अपनी किताब 'बंदिनी' की कविताएं पढ़ेंगी, जिसे उन्होंने दिल्ली में नजरबंदी के दौरान लिखा था। इन कविताओं का मुख्य केंद्र कोलकाता शहर ही है। कार्यक्रम के आयोजकों में शामिल 'पश्चिम बंगर संगे' के मोहित रॉय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से इस कार्यक्रम को मंजूरी दी है और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। इस दौरान लेखिका के साहित्यिक कार्यों पर आधारित संगीत प्रस्तुतियां भी दी जाएंगी।
तस्लीमा नसरीन ने न्यूयॉर्क से अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वह उस शहर में लौटने को लेकर बेहद उत्साहित हैं, जिसे वे सालों से अपना घर मानती रही हैं। उन्होंने बताया कि भले ही उन्हें वर्ष 2007 में निकाला गया था, लेकिन वे अब भी कोलकाता में स्थायी रूप से बसने की इच्छा रखती हैं। नसरीन ने यह भी स्पष्ट किया कि वे बांग्लादेश की स्थिति से अवगत हैं और वहां वापस जाने की उन्हें कोई संभावना नहीं दिखती, क्योंकि वह क्षेत्र अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'द्विखंडिता' और अन्य विवादित पुस्तकों के कारण कट्टरपंथी समूहों से मिल रही धमकियों का भी उल्लेख किया।
वर्ष 2007 की घटना का जिक्र करते हुए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उस समय के विरोध-प्रदर्शनों और सरकार द्वारा सुरक्षा के नाम पर लेखिका को बाहर भेजने के निर्णय ने वाम मोर्चा सरकार की छवि पर गहरा प्रभाव डाला था। तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार को इस मुद्दे को नियंत्रित करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी, जिसका असर बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी देखा गया। अब जब लेखिका दो दशक बाद पुनः लौट रही हैं, तो यह कार्यक्रम राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक सहिष्णुता पर हो रही व्यापक बहस के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम साबित हो रहा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी इस वापसी का स्वागत करते हुए इसे लेखिका की अभिव्यक्ति का अधिकार बताया है।

Lalita Rajput
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