चेन्नई: तमिलनाडु में प्रशासनिक और कानूनी हलकों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए जाने-माने यूट्यूबर और खोजी पत्रकार ए शंकर उर्फ 'सवुक्कु' शंकर की तत्काल रिहाई का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है। राज्य सलाहकार बोर्ड द्वारा की गई एक व्यापक कानूनी समीक्षा के बाद यह प्रशासनिक निर्णय लिया गया है। समीक्षा में पाया गया कि तमिलनाडु निरोधात्मक हिरासत अधिनियम (प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट), 1982 के तहत शंकर की हिरासत को आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस या वैधानिक आधार मौजूद नहीं हैं। इस सरकारी आदेश के बाद सवुक्कु शंकर की जेल से रिहाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है, बशर्ते वे किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित या सजायाफ्ता न हों।

विधिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार, यह निर्णय राज्य सलाहकार बोर्ड द्वारा प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट की धारा 10 के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए लिया गया है। बोर्ड ने हिरासत में लेने वाली जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी गोपनीय दस्तावेजों, खुफिया रिपोर्टों और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया। इसके साथ ही बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत की गई शंकर की मौखिक और लिखित दलीलों को भी गंभीरता से सुना गया। सभी पक्षों को सुनने के बाद सलाहकार बोर्ड ने सर्वसम्मति से निष्कर्ष निकाला कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के नाम पर शंकर को निरोधात्मक हिरासत में रखना वैधानिक रूप से न्यायसंगत नहीं है। बोर्ड की इसी आधिकारिक सिफारिश को स्वीकार करते हुए राज्य गृह विभाग ने उनकी रिहाई की फाइल को मंजूरी दी।

ए शंकर उर्फ 'सवुक्कु' शंकर का विवादों और कानूनी कार्रवाइयों से पुराना नाता रहा है। यह तीसरा ऐसा अवसर है जब उनके खिलाफ प्रशासन द्वारा लगाया गया प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनी समीक्षा के बाद रद्द हुआ है। इससे पहले भी न्यायपालिका और वैधानिक बोर्डों द्वारा उनकी हिरासत को खारिज किया जा चुका है। पूर्व में मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी पहली निरोधात्मक हिरासत को अवैध ठहराते हुए उसे रद्द करने का आदेश दिया था। हालांकि, जेल से बाहर आने से पहले ही उन्हें थेनी जिले में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज एक अन्य पुराने मामले में दोबारा हिरासत में ले लिया गया था, जिसने इस कानूनी गतिरोध को और लंबा खींच दिया था।

हालिया घटनाक्रम की बात करें तो सवुक्कु शंकर को पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के ओंगोल से पुलिस की एक विशेष टीम द्वारा गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि जब उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत चेन्नई लाया जा रहा था, तब उन्होंने और उनके कुछ सहयोगियों ने कथित तौर पर पुलिस एस्कॉर्ट टीम के वाहनों पर पथराव किया था। इस घटना के बाद उन पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला करने और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में एक नया मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने उन पर दोबारा कड़े कानूनी प्रावधान थोप दिए थे, जिसे उनके समर्थकों ने राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित बताया था।

इस मामले में अहम कानूनी मोड़ पिछले सप्ताह तब आया जब मद्रास उच्च न्यायालय ने मामले की प्रगति और जांच की स्थिति को देखते हुए उन्हें हत्या के प्रयास वाले मुकदमे में नियमित जमानत दे दी थी। जमानत मिलने के बावजूद प्रिवेंटिव डिटेंशन लागू होने के कारण उनकी व्यावहारिक रिहाई अटकी हुई थी। अब राज्य सरकार द्वारा निरोधात्मक हिरासत को पूरी तरह वापस लिए जाने के बाद उनके बाहर आने की सभी वैधानिक बाधाएं दूर हो गई हैं। सवुक्कु शंकर की इस लंबी कानूनी लड़ाई और बार-बार होने वाली गिरफ्तारियों ने राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता की सीमाओं और प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनों के प्रशासनिक उपयोग को लेकर एक नई सार्वजनिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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