सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक (custodian and regulator) है, न कि उनकी मालिक। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार किसी ट्रस्टी से मंदिर की संपत्ति को उपहार (gift) के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती, भले ही हस्तांतरण का उद्देश्य सार्वजनिक हित या किसी जनहित कार्य से ही जुड़ा क्यों न हो। मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को पूरी तरह से अमान्य घोषित कर दिया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ था जब तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित नागपालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने 30 अगस्त 2017 को एक गिफ्ट डीड के जरिए मंदिर की 1 एकड़ और 10 सेंट जमीन राज्य सरकार को सौंप दी थी। इस जमीन का हस्तांतरण वहां एक तालुक कार्यालय (Taluk Office) का निर्माण करने के उद्देश्य से किया गया था। इस कदम को इस आधार पर चुनौती दी गई कि ट्रस्टी के पास 'तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम, 1959' के तहत जरूरी कानूनी नियमों का पालन किए बिना मंदिर की संपत्ति किसी अन्य को सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

इससे पहले मार्च 2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने इस हस्तांतरण को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया था। मद्रास हाई कोर्ट का मानना था कि 1959 के अधिनियम की धारा 34 में 'दान' या 'समझौते' का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, इसलिए यह धारा दान के जरिए संपत्ति हस्तांतरित करने पर रोक नहीं लगाती। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने खुद स्वीकार किया कि यह जमीन 'इनाम' (धार्मिक उद्देश्य के लिए दी गई) संपत्ति थी, जो केवल देवता के भरण-पोषण और देखरेख के लिए समर्पित थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह उपहार 'तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959' की धारा 41 का सीधा उल्लंघन करता है। धारा 41 के अनुसार किसी धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण या रखरखाव के लिए दी गई 'इनाम' जमीन को दान करना पूरी तरह से अमान्य (null and void) है। कानून सरकार को केवल ऐसे लेन-देन की अनुमति देता है जो संस्थान के हित में या फायदेमंद हों, लेकिन इसमें 'दान' को पूरी तरह से बाहर रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा उपहार 'शुरुआत से ही शून्य' (void ab initio) होता है और बाद में किसी भी प्रशासनिक मंजूरी से इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि 1959 के अधिनियम के तहत काम करने वाली राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक है, मालिक नहीं। कोर्ट ने कहा कि किसी देवता को समर्पित की गई संपत्ति दानकर्ता की नहीं रहती, बल्कि वह देवता और उन भक्तों के समुदाय की होती है जिनकी सेवा के लिए वह संपत्ति दी गई है। हर संरक्षक इसे केवल एक ट्रस्ट के रूप में रखता है। अधिनियम की धारा 27 और 28 के तहत ट्रस्टियों को मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन उसी सावधानी से करना होता है जैसे कोई समझदार व्यक्ति अपने निजी मामलों का करता है। चूंकि उपहार बिना किसी प्रतिफल (consideration) के दिया जाता है, इसलिए इसे समझदारी भरा प्रबंधन नहीं माना जा सकता।

'के. रामलिंगम और अन्य बनाम तमिलनाडु सरकार और अन्य' के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने गौर किया कि राजस्व विभाग ने इस जमीन को सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया था और सार्वजनिक धन का उपयोग करके वहां निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया था। राज्य ने चार साल से अधिक समय तक इस अवैध गिफ्ट डीड का बचाव किया। राज्य सरकार ने अपना रुख तब बदला जब सुप्रीम कोर्ट ने बंदोबस्त विभाग के प्रभारी सचिव को स्पष्टीकरण देने के निर्देश दिए।

यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को अमान्य कर दिया, लेकिन उसने वहां बने तालुक कार्यालय के लीज को रद्द नहीं किया, क्योंकि प्रशासनिक इमारत का निर्माण सार्वजनिक धन से हो चुका था और वह क्षेत्र की जनता की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर रही थी। हालांकि, अदालत ने मंदिर के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए।

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह 8 मार्च 2019 से लेकर अब तक का बढ़ा हुआ मासिक किराया 31,000 रुपये प्रति माह तय करके बकाया राशि तीन महीने के भीतर चुकाए। इसके अलावा, अदालत ने राज्य सरकार पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया, जो मंदिर को दिया जाएगा। जमीन और निर्मित ढांचे का कुल मूल्य ₹3.04 करोड़ आंका गया, जिसके आधार पर यह किराया निर्धारित किया गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट के पास लीज की अवधि और शर्तों को तय करने का अधिकार होगा और किराये की समीक्षा हर तीन साल में की जाएगी, जिसे ₹31,000 से कम नहीं किया जा सकता।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और HR&CE विभाग को आदेश दिया कि धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्तियों से जुड़े फैसले लेते समय सरकार की प्रशासनिक सुविधा के बजाय केवल और केवल संस्थान के हितों और लाभ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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