सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी को लगाई फटकार; I-PAC रेड में दखल को बताया खतरा
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा ईडी की छापेमारी में हस्तक्षेप को असंवैधानिक और लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा करार दिया है।

I-PAC रेड मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का मुख्य भवन और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (इनसेट)
Supreme Court slams Mamata Banerjee IPAC raid : भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में बुधवार का दिन बेहद नाटकीय रहा, जब सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उन्हें तीखी फटकार लगाई। मामला पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC और उसके को-फाउंडर प्रतीक जैन के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी से जुड़ा है। कोर्ट ने मुख्यमंत्री द्वारा जांच प्रक्रिया में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप को न केवल असंवैधानिक करार दिया, बल्कि इसे पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में परिभाषित किया है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का इस तरह जांच एजेंसी के कार्य में बाधा डालना कल्पना से परे है।
पूरे मामले की जड़ें 8 जनवरी की उस घटना में हैं, जब ईडी की टीम बंगाल कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में छापेमारी कर रही थी। जांच एजेंसी का आरोप है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुलिस के आला अधिकारियों के साथ स्वयं रेड वाली जगह पर पहुंच गईं और न केवल काम में बाधा डाली, बल्कि महत्वपूर्ण दस्तावेज भी अपने साथ ले गईं। इस गंभीर उल्लंघन के खिलाफ ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दाखिल कर मुख्यमंत्री और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को छापेमारी के दौरान हुए उन अभूतपूर्व घटनाक्रमों से अवगत कराया, जिसने जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए थे।
कानूनी दलीलों के दौरान बंगाल सरकार का पक्ष रख रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने इस विवाद को तकनीकी रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह केंद्र और राज्य के बीच का विवाद है, जिसे अनुच्छेद 131 के तहत देखा जाना चाहिए, न कि अनुच्छेद 32 के तहत। हालांकि, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जब कोई मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से रेड के बीच में दखल देता है, तो उसे 'राज्यों का विवाद' कहकर सुरक्षा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि महान विधि विशेषज्ञों ने भी कभी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि एक राज्य की मुखिया किसी एजेंसी के कामकाज में इस तरह हस्तक्षेप करेंगी।
यह मामला अब केवल एक छापेमारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने संघीय ढांचे में जांच एजेंसियों की स्वायत्तता और संवैधानिक पदों की मर्यादा पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ बंगाल पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर भी संज्ञान लिया है। अंततः, सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी संकेत देती है कि जांच प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस मामले का अंतिम परिणाम न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि भविष्य में केंद्र-राज्य संबंधों और न्यायिक समीक्षा के नए मानक भी तय करेगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
