'अदालत को गुमराह न करें अधिकारी' सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप
कॉलेज प्रिंसिपल नियुक्ति मामले में गलत हलफनामा देने पर सर्वोच्च अदालत नाराज, मुख्य सचिव को आचरण की जांच करने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी अफसरों के गैरकानूनी हलफनामे पर नाराजगी जताई और मुख्य सचिव को जांच के आदेश देकर निष्पक्ष रहने को कहा।
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश के एक प्रशासनिक मामले की सुनवाई करते हुए राज्य के अधिकारियों के आचरण को लेकर बेहद गंभीर और तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने दोटूक शब्दों में कहा है कि अदालतों में जवाबी हलफनामा दाखिल करते समय सरकारी अधिकारियों का मूल कर्तव्य तथ्यों और कानून के अनुसार अदालत की निष्पक्ष सहायता करना है, न कि किसी विशेष पक्ष का अनुचित समर्थन या वकालत करना। अदालत ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी कानूनी मर्यादाओं को ताक पर रखकर किसी एक पक्ष के पक्षकार की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) की नियुक्ति के विवाद से जुड़ा हुआ है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष मई में इस विवाद पर एक आदेश पारित किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस अपील पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ अधिकारियों के आचरण को आड़े हाथों लिया। पीठ ने साफ तौर पर रेखांकित किया कि सरकारी अमले ने अदालत के समक्ष मामले की पैरवी करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष का जरूरत से ज्यादा और जोरदार समर्थन किया, जो उनकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कानूनी बारीकियों को स्पष्ट करते हुए सर्वोच्च अदालत की पीठ ने कहा कि 21 अगस्त 2023 को 'उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग अधिनियम, 2023' के लागू होने के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं। नए कानून के अस्तित्व में आने के बाद अधिकारियों के लिए 'उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग अधिनियम, 1980' के तहत तैयार की गई पुरानी सूची के आधार पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई करना पूरी तरह से अनुचित और गैरकानूनी था, क्योंकि पुराना अधिनियम निरस्त किया जा चुका था। इसके बावजूद, संबंधित उच्चाधिकारियों ने स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की।
अदालत ने पाया कि संबंधित विभाग के निदेशक के पास पुरानी निरस्त सूची को दोबारा प्रभावी करने और 13 दिसंबर 2023 को अपीलकर्ता के पक्ष में पत्र लिखने का कोई वैध या तार्किक कारण उपलब्ध नहीं था। अधिकारियों ने न केवल प्रशासनिक स्तर पर यह ढिलाई बरती, बल्कि इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी इसी गैरकानूनी रुख को सही ठहराते हुए हलफनामा दाखिल कर दिया। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने कहा कि यह कृत्य कानून के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत और हाई कोर्ट के पूर्व फैसले की अवहेलना है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे उन अधिकारियों के आचरण की गहन जांच कराएं जिन्होंने अदालत में ऐसा भ्रामक पक्ष रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सरकारी तंत्र को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि सरकार और उसके अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी न्यायालय के समक्ष वास्तविक और सत्य पर आधारित सहायता प्रदान करना है। अदालतें उम्मीद करती हैं कि सरकारी हलफनामे केवल और केवल ठोस तथ्यों तथा लागू होने वाले कानून के अनुरूप ही तैयार किए जाएं। अधिकारियों से कभी भी यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे अपने व्यक्तिगत या किसी बाहरी प्रभाव के कारण कानून की सीमाओं के बाहर जाकर किसी भी पक्ष का अंधाधुंध समर्थन करें।
हालांकि, तकनीकी आधार पर संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से इस मामले में सीधे पक्षकार नहीं थे, इसलिए शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ तुरंत कोई दंडात्मक निर्देश जारी नहीं किया। इसके बावजूद, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पूरी छूट दी है कि वह अदालत द्वारा की गई इन गंभीर टिप्पणियों को अत्यंत संवेदनशीलता से ले और दोषी अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक व कानूनी दायरे में रहते हुए उचित और दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करे। इस फैसले ने प्रशासनिक हलकों में जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
