नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (आईटीपीए) का उद्देश्य न तो वेश्यावृत्ति को पूरी तरह से खत्म करना है और न ही इसे अपराध की श्रेणी में लाना है। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि इस कानून का एकमात्र और मुख्य उद्देश्य इस व्यवस्था के व्यवसायीकरण को रोकना है। इस टिप्पणी के बाद सेक्स वर्कर्स के अधिकारों और कानून के दायरे को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।

न्यायमूर्ति जे बी परदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने इस मामले की विस्तृत समीक्षा करते हुए अपना यह ऐतिहासिक फैसला सुरक्षित किया। पीठ ने कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि वेश्यावृत्ति का उन्मूलन या इसे एक आपराधिक कृत्य घोषित करना देश के 70 साल पुराने कानून का मुख्य एजेंडा कभी नहीं था। इसके विपरीत, इस अधिनियम का असली मकसद संगठित आजीविका के साधन के रूप में वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने वाले नेटवर्क, दलालों और इसके व्यावसायिक रूप को पूरी तरह से समाप्त करना या उस पर अंकुश लगाना है।

इस ऐतिहासिक कानूनी व्याख्या के दौरान अदालत ने इतिहास के पन्नों को भी पलटा। वेश्यालयों से मुक्त कराई गई महिलाओं के पुनर्वास और उनके सुरक्षित भविष्य के संवेदनशील मुद्दे पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने वर्ष 1956 के मूल अधिनियम का गहरा विश्लेषण किया। पीठ ने रेखांकित किया कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में महिलाओं की तस्करी एक आम और स्वीकृत बुराई बन चुकी थी। उस दौर में इसे पूरी तरह से अनैतिक कृत्य माना जाता था, यही वजह थी कि 'अनैतिक' शब्द इस कानून की आत्मा के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया।

अदालत ने अपने फैसले में यौनकर्मियों की स्वतंत्रता और उनके मानवीय गरिमा के अधिकारों को सर्वोपरि माना। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों में राज्य सरकारों और कानून व्यवस्था को कड़े निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पुलिस प्रशासन को अपनी मर्जी से यानी स्वेच्छा से सेक्स वर्क का विकल्प चुनने वाली वयस्क महिलाओं के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। ऐसी यौनकर्मियों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई करना कानूनन गलत माना जाएगा।

दिशानिर्देशों के अनुसार, कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस छापों के दौरान वयस्क यौनकर्मियों को न तो गिरफ्तार किया जाना चाहिए, न ही उन्हें प्रताड़ित या परेशान किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे किसी भी प्रशासनिक ऑपरेशन या पुलिस कार्रवाई के दौरान इन महिलाओं की पहचान को पूरी तरह से गोपनीय रखना अनिवार्य होगा, ताकि वे समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें।

न्यायालय ने यह भी साफ किया कि वयस्क यौनकर्मियों को उनकी मर्जी के खिलाफ न तो किसी संरक्षण गृह में हिरासत में रखा जा सकता है और न ही 'बचाव' के नाम पर उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध कहीं ले जाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पुनर्वास नीतियों से इतर हटकर 'पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास' पर विशेष जोर दिया है, जिसमें यौनकर्मियों की व्यक्तिगत पसंद और उनके आत्मसम्मान को सबसे ऊपर रखा गया है। शीर्ष अदालत का यह फैसला आने वाले समय में देश की कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को एक नया दृष्टिकोण देने का काम करेगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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