रेप पीड़ितों के लिए बदलेगी अदालतों की भाषा, सुप्रीम कोर्ट पैनल ने जारी की नई गाइडलाइन|
सुप्रीम कोर्ट के पैनल ने यौन अपराधों के फैसलों में 'पवित्रता खो दी' जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने और तटस्थ भाषा अपनाने की सिफारिश की है।

सुप्रीम कोर्ट की इमारत और एक न्यायमूर्ति की छवि यौन अपराध मामलों में फैसलों की भाषा बदलने संबंधी रिपोर्ट के संदर्भ में दिखाई दे रही है।
न्यायपालिका में बलात्कार और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों की सुनवाई और फैसलों के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के एक विशेष पैनल ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए अदालती फैसलों में पारंपरिक, पूर्वाग्रह से ग्रस्त और कलंक लगाने वाली शब्दावली के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। समिति ने साफ किया है कि न्याय प्रणाली के भीतर एक नए लैंग्वेज इकोसिस्टम की आवश्यकता है, जो पूरी तरह से तटस्थ और पीड़ित-केंद्रित हो। यह पूरी पहल देश भर के विभिन्न ट्रायल कोर्ट्स के फैसलों के विस्तृत विश्लेषण के बाद सामने आई है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाया जा सके।
यह पूरा घटनाक्रम मुख्य रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेंच के उस निर्देश के बाद शुरू हुआ, जो उन्होंने 10 फरवरी, 2026 को एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक विवादित टिप्पणी पर स्वतः संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने इस दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल का गठन किया गया। इस समिति में गुजरात हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस सोनिया गोकानी, मध्य प्रदेश की पूर्व डीजीपी अनुराधा शंकर, सुप्रीम कोर्ट के वकील सूरत सिंह और मानविज्ञानी लकी टीवी जेहोल बतौर सदस्य शामिल थे। इस पैनल ने देश भर के 125 ट्रायल कोर्ट के जजमेंट का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद 'जजमेंट एंड जेंडर: सेंजिटिविटी एंड कंपैशन इन राइटिंग जजमेंट्स' शीर्षक से अपनी रिपोर्ट तैयार की है।
पैनल ने अपनी रिपोर्ट में अदालतों और जजों से कड़ाई से आग्रह किया है कि वे फैसलों को लिखते समय उन शब्दों और अभिव्यक्तियों से पूरी तरह परहेज करें जो पीड़ितों की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अब अदालती आदेशों या फैसलों में 'बेबस, गरीब बेबस नाबालिग, पवित्रता खो दी, हवस की शिकार, शील या मर्यादा भंग, जिंदगी बर्बाद, बचपन बर्बाद, शर्म और पवित्रता' जैसे अपमानजनक या रूढ़िवादी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसके स्थान पर समिति ने अधिक गरिमापूर्ण और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप शब्दों के प्रयोग की सिफारिश की है। जजों से अपेक्षा की गई है कि वे ऐसे मामलों में 'पीड़ित, सर्वाइवर, शिकायतकर्ता, यौन हमला, यौन अपराध, यौन हिंसा और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन' जैसे गरिमामयी शब्दों को अपनाएं।
समिति ने अपनी सिफारिशों में यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका की भाषा केवल लिखने का एक स्टाइल भर नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर न्याय के स्वरूप को आकार देती है। इस प्रकार की भाषा से न केवल न्याय पाने वाले पीड़ितों के विचार प्रभावित होते हैं, बल्कि समाज में यौन हिंसा को देखने का नजरिया भी तय होता है। रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि जजों को 'वेश्या, पतित स्त्री, मिसट्रेस, रखैल, कॉल गर्ल और प्रॉस्टीट्यूट' जैसे शब्दों के उपयोग से भी बचना चाहिए और जरूरत पड़ने पर 'पार्टनर या सेक्स वर्कर' जैसे तटस्थ शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा, पैनल ने पीड़ित पर ही दोष मढ़ने या सवाल उठाने की प्रवृत्ति की कड़ी निंदा की है।
विशेष रूप से, समिति ने यह बहुत ही सख्त निर्देश दिया है कि किसी भी महिला को उसके पहनावे, कपड़ों या उसके चरित्र, शालीनता और नैतिकता के आधार पर आंकना एक सभ्य समाज के लिए पूरी तरह से अस्वीकार्य और अक्षम्य है। आपराधिक न्याय प्रक्रिया के दौरान पीड़ित महिलाओं से इस तरह के सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए कि वह उस खास समय पर बाहर क्यों थीं, उन्होंने किस तरह के कपड़े पहने थे या उनके साथ कोई पुरुष रिश्तेदार क्यों मौजूद नहीं था। इस रिपोर्ट और गाइडलाइंस का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्याय प्रणाली में संवेदनशीलता और करुणा को सर्वोपरि रखा जाए, जिससे पीड़ितों को न्याय की तलाश में अतिरिक्त मानसिक प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
