संसद के विशेष सत्र से पहले सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर महिला आरक्षण: तत्काल कार्यान्वयन पर आज महासुनवाई

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नारी शक्ति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में एक नया और निर्णायक अध्याय जुड़ता नजर आ रहा है। देश की संसद में महिलाओं की एक-तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने वाले 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लेकर कानूनी और राजनीतिक खींचतान अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुंच गई है। संसद के आगामी विशेष सत्र के शुरू होने से ठीक पहले, सुप्रीम कोर्ट आज उस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें महिला आरक्षण विधेयक को बिना किसी देरी के तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग की गई है। यह मामला न केवल आधी आबादी के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह आगामी चुनावी राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

इस कानूनी विवाद की जड़ें कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर उस याचिका में हैं, जिसमें केंद्र सरकार के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है जिसके तहत आरक्षण के कार्यान्वयन को भविष्य की जनगणना और परिसीमन अभ्यास से जोड़ा गया है। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटों का कोटा स्थगित करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर सार्वजनिक की गई कार्यसूची के अनुसार, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की खंडपीठ इस संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले मामले की गंभीरता का परीक्षण करेगी।

विधेयक की कानूनी बारीकियों पर गौर करें तो नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मौखिक टिप्पणी के दौरान इस बात पर जोर दिया था कि कानून के उन प्रावधानों को रद्द करना एक जटिल प्रक्रिया होगी जो आरक्षण को दशकीय जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद लागू करने की बात कहते हैं। हालांकि, याचिकाकर्ता का पक्ष यह है कि चूंकि निर्वाचित निकायों में सीटों की कुल संख्या पहले से ही निर्धारित है, इसलिए जनगणना जैसी पूर्व शर्तें अनावश्यक हैं। याचिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद विधायी निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम बना हुआ है, जिसे तत्काल सुधारने की आवश्यकता है।

राजनीतिक धरातल पर यह मुद्दा तब और गरमा गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के विशेष सत्र से पहले सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को एक औपचारिक पत्र लिखकर इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने और 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले इसके कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने हेतु समर्थन मांगा। प्रधानमंत्री का मानना है कि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प की सिद्धि के लिए विधायी निकायों में महिलाओं की सक्रिय और बड़ी भागीदारी अनिवार्य है। उनके अनुसार, यह कानून केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं बल्कि देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना के सही अर्थों में प्रकटीकरण का समय है।

दूसरी ओर, विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इस प्रस्तावित विशेष सत्र और विधेयक के समय को लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस ने विशेष रूप से तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करार दिया है। विपक्षी दलों की मांग है कि महिला आरक्षण के कार्यान्वयन की दिशा में किसी भी विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले परिसीमन के मुद्दे पर एक व्यापक सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का आज का रुख यह निर्धारित करेगा कि महिला आरक्षण का भविष्य जनगणना के आंकड़ों में उलझा रहेगा या नारी शक्ति को उनका संवैधानिक अधिकार जल्द प्राप्त होगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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