सर्वोच्च न्यायालय ने किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों में पॉक्सो (POCSO) कानून के कथित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ किशोरों के निजता के अधिकार से जुड़े एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि कोई लड़का और लड़की अपनी मर्जी से घर छोड़ते हैं, तो राज्य द्वारा ऐसे मामलों को किस आधार पर रोका जा सकता है।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि 15 से 18 वर्ष की आयु भावनात्मक परिवर्तनों की होती है और ऐसे हर मामले को पॉक्सो कानून के दायरे में लाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि अक्सर जब किशोरियां अपने साथी के साथ घर छोड़ती हैं, तो परिवार अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा बचाने के लिए पॉक्सो के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज करा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप, कई युवाओं को अनावश्यक रूप से जेल का सामना करना पड़ता है और अंततः अदालतों को उन्हें बरी करना पड़ता है।

कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर चर्चा करते हुए, अदालत ने उल्लेख किया कि वर्ष 2012 में सहमति की आयु 16 से बढ़ाकर 18 वर्ष किए जाने के बाद से इस तरह के संबंध कानूनन अवैध हो गए हैं। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामले कानून में बदलाव से पहले भी अस्तित्व में थे, इसलिए न्यायिक निर्देश व्यावहारिक होने चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पॉक्सो मामलों की निगरानी के लिए एक डैशबोर्ड बनाने का सुझाव भी दिया, ताकि कानून के दुरुपयोग पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाई जा सके। यह मामला किशोरों की स्वतंत्रता और कानून के उचित कार्यान्वयन के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

Lalita Rajput

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