वर्ष 1963 में बर्मिंघम जेल से मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही थी कि यदि न्याय समय पर न मिले, तो वह अन्याय के समान होता है। इसी सत्य की पुष्टि उत्तर प्रदेश से जुड़े 1977 के एक हत्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने की है। लगभग 49 वर्षों तक कानूनी दांव-पेच और जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। विडंबना यह है कि बरी होने वाले इन आरोपियों में से एक हीरा लाल पहले ही उम्रकैद की सजा काट चुके थे, जबकि अन्य दो आरोपियों का निधन इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान हो चुका है।

यह मामला उत्तर प्रदेश के एक हत्या कांड से संबंधित है, जिसमें निचली अदालत और इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहरा की खंडपीठ ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई की। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों और चश्मदीदों की गवाही में गंभीर विसंगतियां और खामियां मौजूद थीं।

आरोपी हीरा लाल ने दशकों तक स्वयं को निर्दोष बताते हुए अपनी बेगुनाही का दावा किया। हालांकि, निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक के फैसलों ने उन्हें दोषी माना, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें उम्रकैद काटना पड़ा। यद्यपि 2013 में दो अन्य आरोपियों को जमानत मिल गई थी, लेकिन हीरा लाल की याचिका खारिज होने के कारण उन्हें जेल में ही रहना पड़ा। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सजा माफी के बाद ही वे जेल से बाहर आ सके थे।

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि घटना 28 जून 1977 की दोपहर को उसी तरह हुई थी, जैसा कि कथित चश्मदीदों द्वारा दावा किया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि अभियोजन की पूरी कहानी इन्हीं गवाहों के बयानों पर टिकी थी, जिन्हें अब साक्ष्यों के अभाव में खारिज किया जाता है। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने चश्मदीदों के संदिग्ध बयानों पर भरोसा करके भूल की थी। अंततः, संदेह का लाभ देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया, जो एक लंबी कानूनी लड़ाई का पटाक्षेप है।

Lalita Rajput

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