162 साल बाद ब्रिटेन से स्वदेश वापसी की आस: क्या बर्मिंघम म्यूजियम से भारत लौटेगी सुल्तानगंज की बुद्ध प्रतिमा?
बिहार के सुल्तानगंज से 1861 में ब्रिटेन ले जाई गई भगवान बुद्ध की 500 किलोग्राम वजनी प्राचीन कांस्य प्रतिमा को वापस लाने के लिए बिहार सरकार ने केंद्र से मांग की है।

ब्रिटेन के संग्रहालय में संरक्षित भगवान बुद्ध की प्राचीन कांस्य प्रतिमा के संदर्भ में उसकी ऐतिहासिकता और स्वदेश वापसी की मांग को दिखाया गया है।
बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से 162 साल पहले मिली भगवान बुद्ध की प्राचीन और विशाल कांस्य प्रतिमा को वापस स्वदेश लाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। यह ऐतिहासिक और बहुमूल्य प्रतिमा वर्तमान में ब्रिटेन के बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में प्रदर्शित है। बिहार सरकार ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन को मजबूती देने के उद्देश्य से इस अमूल्य धरोहर को वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को एक औपचारिक पत्र लिखा है।
पुरातत्व विभाग के अनुसार, गुप्त और उत्तर-गुप्त काल (यानी लगभग 500 से 700 ईस्वी) की यह प्रतिमा भारत की सबसे बड़ी और बहुमूल्य प्राचीन धातु प्रतिमाओं में से एक मानी जाती है। भगवान बुद्ध की यह प्रतिमा करीब 2.3 मीटर ऊंची है और इसका कुल वजन लगभग 500 किलोग्राम है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह प्रतिमा वर्ष 1861 में ईस्ट इंडियन रेलवे के निर्माण कार्य के दौरान सुल्तानगंज में एक बौद्ध विहार के टीले की खुदाई के दौरान मिली थी। इसके बाद, रेलवे इंजीनियर ई.बी. हैरिस ने लगभग 200 पाउंड खर्च कर इसे जहाज के जरिए इंग्लैंड भिजवा दिया था और साल 1864 में इसे बर्मिंघम म्यूजियम को दान कर दिया था।
भगवान बुद्ध की इस ऐतिहासिक धरोहर को स्वदेश वापस लाने के प्रयास पहले भी किए जा चुके हैं। हालांकि, उस समय बर्मिंघम म्यूजियम प्रबंधन ने ब्रिटिश कानूनों का हवाला देते हुए इसे लौटाने से साफ इनकार कर दिया था। म्यूजियम का तर्क था कि यह प्रतिमा उन्हें दान के रूप में मिली थी और पिछले 162 वर्षों से यहां पूरी तरह सुरक्षित रखी गई है, जहां दुनिया भर के पर्यटक इसे देखने आते हैं। फिलहाल, बिहार के कला एवं संस्कृति विभाग को इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी नई आधिकारिक कार्रवाई की सूचना नहीं मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रतिमा की वापसी से राज्य में पर्यटन को एक नई दिशा मिलेगी। भागलपुर संग्रहालय के पूर्व अध्यक्ष शिव कुमार मिश्र का कहना है कि वर्तमान में बिहार में बोधगया, नालंदा, विक्रमशिला और वैशाली प्रमुख बौद्ध सर्किट केंद्र के रूप में स्थापित हैं। ऐसे में सुल्तानगंज की यह महत्वपूर्ण प्रतिमा यदि अपने मूल स्थान पर वापस आ जाती है, तो इसे विक्रमशिला पुरातात्विक संग्रहालय या सुल्तानगंज के प्रस्तावित बौद्ध सर्किट में स्थापित किया जा सकता है। इससे न केवल बिहार के सांस्कृतिक गौरव की बहाली होगी, बल्कि भागलपुर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को भी अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा।
इस प्रतिमा को वापस लाने के लिए अब सरकारी और स्थानीय स्तर पर प्रयास फिर से तेज होते नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से विदेश मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के साथ औपचारिक बातचीत शुरू करने का आग्रह किया है। इसके साथ ही, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रेमियों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सुल्तानगंज के विधायक प्रो. ललित नारायण मंडल ने कहा है कि वे इस मामले में दोबारा विभागीय मंत्री से मुलाकात कर केंद्र से पत्राचार करने का अनुरोध करेंगे। वहीं, स्थानीय पर्यटन प्रेमी डॉ. देवज्योति मुखर्जी ने भी प्रतिमा की वापसी के संबंध में ब्रिटिश दूतावास को ई-मेल भेजने का निर्णय लिया है।

Lalita Rajput
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