होर्मुज संकट के बीच 'डार्क मोड' में चल रहे ईंधन टैंकर, भारत को गुप्त रास्तों से हो रही कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति
पश्चिम एशिया युद्ध के कारण जहाजों ने बंद किए ट्रांसपोंडर, वोर्टेक्सा के अनुसार 65% टैंकर छिपे, ईरान के नियंत्रण वाले कॉरिडोर से भारत पहुंच रहा ईंधन।

होर्मुज संकट के बीच समुद्री टर्मिनल पर कतार में खड़े ईंधन टैंकर, जो वैश्विक डार्क मोड तेल आपूर्ति को दर्शाते हैं।
पश्चिम एशिया के अशांत समंदर में चल रहे भीषण युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक ऐसे अभूतपूर्व मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां तेल और गैस के प्रवाह को ट्रैक करना अब अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के लिए लगभग असंभव हो चुका है। रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाला वाणिज्यिक जहाजों का यातायात युद्ध की विभीषिका के कारण अपने सामान्य स्तर से 90 से 95 प्रतिशत तक नीचे गिर चुका है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की इस जीवनरेखा पर मंडराते संकट के बावजूद, भारत जैसे प्रमुख विकासशील देशों की घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) की कुछ महत्वपूर्ण खेप अभी भी बेहद गोपनीय तरीके से निकाली जा रही हैं। यह गुप्त ऑपरेशन इतने सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया जा रहा है कि वैश्विक खरीदारों तक पहुंचने वाली वास्तविक ऊर्जा आपूर्ति का वास्तविक डेटा जुटाना नामुमकिन हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय शिपिंग डेटा और मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म 'वोर्टेक्सा' (Vortexa) के हालिया विश्लेषण के अनुसार, इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले अधिकांश कमर्शियल तेल टैंकरों ने अब एक नई और बेहद जोखिम भरी 'डार्क मोड' रणनीति को अपना लिया है। इस रणनीति के तहत, विशालकाय जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करते समय अथवा फारस की खाड़ी में ईंधन लादने के लिए प्रवेश करते वक्त अपने सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरण यानी ट्रांसपोंडर (AIS - ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) को पूरी तरह बंद कर देते हैं। इस ऑटोमैटिक सिस्टम के बंद होते ही उपग्रहों और वैश्विक ट्रैकिंग प्रणालियों की स्क्रीन से इन जहाजों का वजूद पूरी तरह गायब हो जाता है। अतीत में इस डार्क-मोड रणनीति का इस्तेमाल केवल ईरान से जुड़े जहाज अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की नजरों से बचने के लिए करते थे, लेकिन वर्तमान युद्ध की विभीषिका के बीच अब आम वाणिज्यिक जहाजों के लिए भी यह समंदर में बने रहने का एकमात्र विकल्प बन चुका है।
इस परिचालन संबंधी आपातस्थिति की पुष्टि करते हुए वोर्टेक्सा के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस पूरे क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों में से लगभग 57 प्रतिशत ने स्वेच्छा से अपने ट्रांसपोंडर बंद रखे, और युद्ध के चौथे महीने में प्रवेश करते ही मई के दौरान यह आंकड़ा रिकॉर्ड 65.2 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। मैरीटाइम एक्सपर्ट्स का स्पष्ट तौर पर कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में ट्रांसपोंडर को बंद रखना अब केवल किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध या आर्थिक बैन से बचने का तकनीकी हथकंडा मात्र नहीं रह गया है। इसके विपरीत, यह बढ़ते युद्ध जनित खतरों, अत्यधिक परिचालन संबंधी अनिश्चितताओं और खाड़ी देशों के तेल टर्मिनलों से ईंधन की खेप को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए शिपिंग कंपनियों द्वारा तैयार किया गया एक व्यापक कमर्शियल रिस्पॉन्स बन चुका है। इसके परिणामस्वरूप, वास्तविक समय में वैश्विक तेल शिपमेंट की निगरानी करना इतिहास में सबसे जटिल हो गया है।
इस खतरनाक समुद्री नाकेबंदी और सुरक्षा चुनौतियों के बीच भी भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे प्रमुख एशियाई खरीदारों के लिए कच्चे तेल तथा एलएनजी की आपूर्ति श्रृंखला को टूटने नहीं दिया गया है। खुफिया जहाजरानी सूत्रों के अनुसार, इन देशों के लिए भेजी जाने वाली तेल की खेप लगातार गुप्त समुद्री कॉरिडोर और विशेष रास्तों के जरिए गंतव्य तक पहुंचाई जा रही है। इस गुप्त कॉरिडोर के सुचारू संचालन के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के इस पूरे जलमार्ग पर अब ईरान का परिचालन और रणनीतिक नियंत्रण पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है। ईरान द्वारा स्वीकृत और संरक्षित रास्तों का उपयोग करके ही ये टैंकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और युद्ध के खतरों को चकमा देने में सफल हो रहे हैं।
युद्ध की शुरुआत में वैश्विक बाजार के बड़े नीति नियंताओं और आर्थिक विश्लेषकों का यह दृढ़ अनुमान था कि मई महीने के अंत तक यह क्षेत्रीय संघर्ष पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, जिससे जून की शुरुआत से ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों का सामान्य आवागमन पहले की तरह बहाल हो सकेगा। हालांकि, तमाम अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों के विफल होने के बाद यह युद्ध अब अपने चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है और जमीनी स्थिति सामान्य होने से कोसों दूर है। सामरिक विशेषज्ञों ने इस संदर्भ में एक गंभीर आधिकारिक चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि भविष्य में किसी भी संभावित कूटनीतिक समझौते या शांति संधि के बावजूद, यह समुद्री मार्ग अब वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईरान इस पूरे संकट का लाभ उठाकर भविष्य में भी इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना पूर्ण परिचालन और दंडात्मक नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, जो भारत जैसे ऊर्जा-आयात निर्भर देशों की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय विषय बन चुका है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
