मोदी की एक आवाज पर पिघल गया दक्षिण का 'स्वर्ण युग'! शादियों के सीजन में सूनी पड़ीं दुकानें, विरोधियों की बढ़ी टेंशन|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक साल तक सोना न खरीदने की अपील के बाद पारंपरिक रूप से सबसे बड़े उपभोक्ता माने जाने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों में सोने की मांग गिर गई है।

दक्षिण भारत के एक पारंपरिक मंदिर परिसर के निकट स्वर्ण पात्र में रखे पवित्र कमल के फूल और सोने के आभूषण।
देश के आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने व्यापारिक विश्लेषकों से लेकर राजनीतिक रणनीतिकारों तक को हैरान कर दिया है। पारंपरिक रूप से देश में बहुमूल्य धातुओं के सबसे बड़े गढ़ माने जाने वाले दक्षिण भारत में सोने की मांग में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, हाल ही में समाप्त हुए पखवाड़े में देश के भीतर सोने की मांग पिछले वर्ष की समान अवधि के करीब 25 टन से घटकर महज 7.5 टन के स्तर पर आ सिमटी है। बाजार में आई इस सत्तर फीसदी की भारी गिरावट के पीछे केंद्र सरकार द्वारा आयात शुल्क में की गई बढ़ोतरी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक विशेष सार्वजनिक अपील को मुख्य कारक माना जा रहा है। इस आर्थिक बदलाव ने दक्षिण के राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते प्रभाव को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
इस बड़े आर्थिक घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब केंद्र सरकार ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित करने के उद्देश्य से सोने पर लागू आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी को छह फीसदी से बढ़ाकर सीधे पंद्रह फीसदी कर दिया। इस नीतिगत निर्णय के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के सिकंदराबाद में आयोजित एक विशाल जनसभा के मंच से देशवासियों, विशेषकर दक्षिण भारत के नागरिकों से एक भावुक अपील की थी। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है, इसलिए देशहित में हमें यह संकल्प लेना होगा कि अगले एक साल तक घर में कोई भी मांगलिक कार्यक्रम हो, हम सोने के नए आभूषणों की खरीद से पूरी तरह परहेज करेंगे।
द इकनॉमिक टाइम्स की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री की इस अपील का सबसे गहरा और व्यापक असर उन्हीं दक्षिणी राज्यों में देखा जा रहा है, जिन्हें अमूमन बीजेपी का पारंपरिक गढ़ नहीं माना जाता है। भीमा ज्वैलरी के चेयरमैन बी गोविंदन ने बाजार की वास्तविक स्थिति को बयां करते हुए कहा कि उपभोक्ता इस समय अपने तय बजट की सीमाओं को पार नहीं कर रहे हैं। वे बेहद हल्के और कम कैरेट वाले आभूषणों का चयन कर रहे हैं। इसके विपरीत, बाजार में इस समय पुराने सोने को बेचकर नकद हासिल करने के लिए उपभोक्ताओं के बीच एक अभूतपूर्व होड़ मची हुई है। इसी प्रकार, इंडिया बुलियन एंड जूलर्स एसोसिएशन (IBJA) के नेशनल सेक्रेटरी सुरेंद्र मेहता ने पुष्टि की है कि आयात शुल्क बढ़ने और अधिक मास की शुरुआत होने के कारण निवेश मांग पूरी तरह से थम गई है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान असंगठित सर्राफा कारोबार को उठाना पड़ रहा है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की अनुसंधान प्रमुख कविता चाको ने इस स्थिति का तकनीकी विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि सरकारी घोषणा के तुरंत बाद बड़े रिटेल चेन स्टोर्स में कुछ समय के लिए घबराहट में खरीदारी देखी गई थी, क्योंकि उपभोक्ताओं को आगे और कड़े कदमों की आशंका थी। हालांकि, अब बड़े ज्वैलर्स अपने इन्वेंट्री बफर और शादियों के पारंपरिक गहनों की मांग के सहारे खुद को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन छोटे खुदरा विक्रेताओं पर बिक्री की मात्रा और लाभ मार्जिन को बनाए रखने का अत्यधिक दबाव बढ़ गया है। वहीं, प्रसिद्ध रिटेल चेन जॉयलुक्कास के अध्यक्ष जॉय अलुक्कास ने स्वीकार किया कि उनके प्रतिष्ठानों में बिक्री में पैंतीस फीसदी से अधिक की सीधी मंदी आई है, और इसका श्रेय केवल करों में वृद्धि को नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की अपील से प्रभावित हुई उपभोक्ता भावना को जाता है।
इस आर्थिक बदलाव के समानांतर यदि दक्षिण भारत के राजनीतिक परिदृश्य का आकलन किया जाए, तो यह साफ झलकता है कि भारतीय जनता पार्टी हिंदी भाषी क्षेत्र की अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलकर दक्षिण के राज्यों में स्थानीय स्तर पर खुद को मजबूती से स्थापित कर रही है। कर्नाटक को जहां लंबे समय से बीजेपी का दक्षिण का प्रवेशद्वार माना जाता रहा है, वहीं अब आंध्र प्रदेश में टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ रणनीतिक गठबंधन और तेलंगाना में सीधे चुनावी मुकाबलों के जरिए पार्टी ने अपना आधार व्यापक किया है। लोकसभा चुनावों के परिणाम इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने दक्षिण भारत की कुल पचास सीटों पर विजय प्राप्त की है, जिसने केंद्र में तीसरी बार सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभाई।
तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में, जहां भाषाई और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों के कारण भाजपा को हमेशा से बेहद कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता था, वहां भी पार्टी के वोट शेयर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। तमिलनाडु में सीट न जीतने के बावजूद एनडीए का वोट शेयर बढ़कर ग्यारह फीसदी तक पहुंच गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण के समाज में हाशिए पर पड़े समूहों को मुख्यधारा में शामिल करने की नीति, कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और सीधे तौर पर काम कर रहे 'मोदी फैक्टर' ने दक्षिणी उपभोक्ताओं की मानसिकता को प्रभावित किया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक अपील को गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी इतनी गंभीरता से लिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेतक है कि केंद्र सरकार का वैचारिक प्रभाव अब भौगोलिक सीमाओं को पार कर सुदूर दक्षिण के जनमानस के भीतर गहराई से पैठ बना चुका है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
