अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट में इन दिनों भारी तनाव का माहौल बना हुआ है और यहाँ की सियांग घाटी पूरी तरह से उबल रही है। राज्य के इस क्षेत्र में भारत सरकार के एक प्रस्तावित मेगा डैम को लेकर पिछले दो हफ्तों से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए पासीघाट शहर और पूरे पूर्वी सियांग जिले में केंद्रीय सशस्त्र बल यानी सीएपीएफ की भारी तैनाती की गई है। इस विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट है, जिसके तहत सियांग नदी पर एक विशाल बांध और जलाशय बनाने की योजना बनाई जा रही है। इस प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय लोगों और विशेषकर युवा पीढ़ी में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। प्रदर्शनकारियों का यह स्पष्ट रूप से कहना है कि इस मेगा बांध और उसके जलाशय के निर्माण से राज्य के लगभग 32 गांव पूरी तरह से पानी में डूब जाएंगे, जिससे स्थानीय निवासियों का जीवन और उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।

यह पूरा विवाद तब और अधिक हिंसक हो गया जब गत 23 अक्टूबर को इस परियोजना को पूरी तरह से रद्द करने की मांग कर रहे उग्र प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन यानी एनएचपीसी के एक कार्यालय और कुछ पुलिस वाहनों में आग लगा दी। इसके अलावा यह भी जानकारी सामने आई है कि प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर दो स्थानीय विधायकों और राज्य के भाजपा प्रमुख के आवासों में भी तोड़फोड़ की और वहां लूटपाट जैसी घटनाएं को अंजाम दिया। इन तमाम हिंसक घटनाओं और कानून व्यवस्था बिगड़ने के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए लगभग 10 पुलिस मामले दर्ज किए हैं और इस सिलसिले में 26 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए 24 अक्टूबर को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने राज्य में फैली हिंसा और इस पूरे मामले पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से किसी भी प्रकार की हिंसा छोड़कर बातचीत के रास्ते पर आने का प्रस्ताव रखा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए मुख्यमंत्री ने लिखा कि सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को लेकर जनता के बीच कई तरह की गलत जानकारियां और गलतफहमियां फैली हुई हैं, जिसकी वजह से लोगों के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तथ्यों की जानकारी देना, पूरी तरह से पारदर्शिता बरतना और जनता के साथ खुली बातचीत करना इस गलतफहमी के अंतर को दूर करने के लिए बेहद जरूरी है। राज्य की भाजपा सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में जिस 'प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट' पर काम चल रहा है, वह केवल एक तकनीकी आकलन मात्र है और इसका यह कतई मतलब नहीं है कि बांध के निर्माण के लिए अंतिम मंजूरी मिल चुकी है। सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया है कि यदि यह सियांग प्रोजेक्ट तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं पाया जाता है, तो इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और साथ ही यह भी कहा कि आम जनता की इच्छा के खिलाफ जाकर इस योजना को किसी भी हाल में लागू नहीं किया जाएगा।

अब यह सवाल सबसे बड़ा है कि आखिर भारत सरकार चीन के मुकाबले के लिए इस मेगा डैम को क्यों बनाना चाहती है। दरअसल, भारत सियांग नदी पर 11,200 मेगावाट का एक बहुत बड़ा बांध और जलाशय बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य चीन की उस बड़ी परियोजना का मुकाबला करना है, जिसके तहत चीन नदी के ऊपरी हिस्से में 60,000 मेगावाट की एक विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित करने की योजना बना रहा है। यह नदी मुख्य रूप से तिब्बत से निकलती है और चीन से होकर बहती हुई अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के रास्ते भारत में प्रवेश करती है। यह वही महत्वपूर्ण नदी है जो आगे चलकर अन्य दो नदियों से मिलती है और असम में इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है, जबकि स्थानीय स्तर पर ब्रह्मपुत्र नदी को 'यारलुंग त्सांगपो' कहा जाता है। चीन की इन जल-विद्युत परियोजनाओं की योजनाओं ने नई दिल्ली के नीति निर्माताओं और सुरक्षा जानकारों के लिए गंभीर सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा कर दी हैं। नई दिल्ली के अनुमान के मुताबिक चीन की इस परियोजना की वजह से लगभग 40 अरब क्यूबिक मीटर पानी का रुख मोड़ा जा सकता है, जिसका तोड़ निकालने के लिए केंद्र सरकार ने 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' यानी एसयूएमपी की योजना बनाई है, जिसकी देखरेख नेशनल हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन द्वारा की जा रही है।

रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अरुणाचल प्रदेश में भारत की ये प्रस्तावित बांध परियोजनाएं बेहद अहमियत रखती हैं। भारत की सीमा के पास 'ग्रेट बेंड' यानी महान मोड़ वाले इलाके में चीन का 60 गीगावॉट का जो हाइडल प्रोजेक्ट चल रहा है, वह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। यह कोई एक सामान्य बांध नहीं है, बल्कि पांच जलविद्युत स्टेशनों की एक बहुत बड़ी श्रृंखला है। ऐसे में चीन की इन भारी-भरकम और आक्रामक गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए भारत को मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना बेहद जरूरी हो गया है। इसके अलावा पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी अरुणाचल प्रदेश देश के एक बड़े 'हाइडल पावरहाउस' के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह क्षेत्र भारत को अक्षय ऊर्जा की ओर आगे बढ़ाने में काफी मदद कर सकता है, जो कि काफी हद तक जलविद्युत पर निर्भर है। साथ ही यह परियोजना देश के जल भंडारण के लक्ष्यों को पूरा करने और वर्ष 2070 तक 'कार्बन न्यूट्रल' बनने के भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में भी काफी मददगार साबित हो सकती है।

भौगोलिक और प्राकृतिक रूप से भारत के पास एक बहुत बड़ा प्राकृतिक लाभ भी मौजूद है। इस बात को समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि भले ही चीन को नदी के ऊपरी हिस्से में होने का भौगोलिक फायदा मिला हुआ है, लेकिन उसका यह दबदबा पूरी तरह से निर्णायक नहीं है। ब्रह्मपुत्र नदी में पानी की सबसे अधिक मात्रा असल में भारत में प्रवेश करने के बाद ही जुड़ती है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यहाँ भारी मानसूनी बारिश होती है और साथ ही अरुणाचल प्रदेश तथा असम में बहने वाली कई तेज बहाव वाली सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं। पानी के बहाव का यह प्राकृतिक असंतुलन भारत को एक शांत लेकिन बहुत ही मजबूत और महत्वपूर्ण बढ़त प्रदान करता है। यही वजह है कि भारत की रणनीति पूरी तरह से वैज्ञानिक आधार पर टिकी हुई है, जिसमें एक ऐसा एकीकृत दृष्टिकोण शामिल है जिसके तहत जल भंडारण, तटबंधों का निर्माण, बाढ़ के पानी को दूसरी दिशा में मोड़ना और अंतर्देशीय जल परिवहन जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। आंकड़ों के अनुसार तिब्बत से ब्रह्मपुत्र नदी के कुल सालाना बहाव का केवल 14 प्रतिशत हिस्सा ही आता है, जबकि इसका बाकी बचा हुआ 86 प्रतिशत पानी भारत के भीतर ही उत्पन्न होता है और जुड़ता है। इस वजह से भारत को इस मामले में चीन के मुकाबले एक बहुत बड़ी रणनीतिक बढ़त मिली हुई है।

इसके बावजूद भारत के लिए ये डैम बनाना क्यों जरूरी है, इसके पीछे कुछ और भी गंभीर वजहें हैं। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने पहले ही चीन के निर्माणाधीन 60 गीगावाट के मेगा बांध को लेकर यह चेतावनी दी है कि यह उनके राज्य की स्थानीय जनजातियों और उनकी आजीविका के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। तिब्बत की प्रमुख नदियों पर चीन द्वारा जिस प्रकार धड़ल्ले से कई बांधों का निर्माण किया जा रहा है, उसकी वजह से चीन जब चाहे तब नदियों के प्राकृतिक बहाव को अपनी मर्जी से नियंत्रित कर सकता है। इससे कभी भी अचानक भयंकर बाढ़ आने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, या फिर इसके विपरीत सूखे के मौसम में नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह के संभावित खतरों और आपदाओं को देखते हुए भारत को भी अपनी तरफ से अपनी जल भंडारण क्षमता को मजबूत करना होगा। एक बड़ा जलाशय या रिजर्वायर अचानक आने वाली बाढ़ की तीव्रता को काफी हद तक कम कर सकता है और पानी के अत्यधिक बहाव को नियंत्रित करने में सहायक साबित हो सकता है।

इन तमाम प्रोजेक्ट्स के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय 'हाइड्रो-डिप्लोमेसी' यानी जल-कूटनीति में भारत की मोलभाव करने की ताकत में भी काफी इजाफा हो सकता है। यह बात इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि बीजिंग यानी चीन सरकार ब्रह्मपुत्र नदी के पानी के न्यायसंगत बंटवारे से जुड़ी किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि का हिस्सा नहीं है। इसके अलावा चीन केवल बाढ़ के मौसम के दौरान ही भारत के साथ कुछ जल आंकड़े साझा करता है, जो कि व्यावहारिक रूप से केवल एक नाममात्र की औपचारिकता बनकर रह जाती है। चीन की तरफ से पूरे साल या 'रियल-टाइम' यानी तत्काल अपडेट्स भारत को नहीं मिलते हैं। यदि सूखे के महीनों की बात की जाए तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। भले ही सामान्य दिनों में भारत के पास अपनी तरफ काफी पानी मौजूद रहता हो, लेकिन सूखे के मौसम में चीन की तरफ से ऊपर के बहाव से आने वाला पानी बहुत अहमियत रखता है, भले ही उसकी मात्रा प्रतिशत के हिसाब से कम ही क्यों न हो। सूखे के महीनों में ऊपर की तरफ से आने वाला पानी बहुत मायने रखता है क्योंकि उस समय पानी की हर एक बूंद की कीमत और जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। इन्ही सभी तकनीकी, रणनीतिक और सुरक्षात्मक कारणों को ध्यान में रखते हुए पानी के सुरक्षित भंडारण की सुविधा वाला एक बहुउद्देशीय बांध होना भारत के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है, हालांकि स्थानीय स्तर पर हो रहे भारी विरोध के चलते प्रशासन और सरकार के सामने इसे शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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