नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के गलियारों में बौद्धिक बहस और वैचारिक टकराव का एक नया अध्याय जुड़ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और कूटनीतिक मामलों के जानकार शशि थरूर ने पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय समझ का पुरजोर बचाव किया है। आमतौर पर संगठनात्मक मुद्दों पर तटस्थ रुख अपनाने वाले थरूर ने इस बार बेहद आक्रामक अंदाज में देश के जाने-माने इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा के एक वायरल साक्षात्कार के दावों का खंडन किया है। थरूर ने इतिहास और वैश्विक राजनीति के व्यावहारिक उदाहरणों के जरिए गुहा के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।

इस विवाद की शुरुआत प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा के एक हालिया साक्षात्कार से हुई, जो इन दिनों सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर काफी प्रसारित हो रहा है। इस साक्षात्कार में गुहा ने यह तो स्वीकार किया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैचारिक नीतियों के मुखर विरोधी हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने राहुल गांधी की योग्यता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। गुहा ने दावा किया कि उनके जैसे कई मोदी-विरोधी लोग भी यह मानने को विवश हैं कि राहुल गांधी अंतरराष्ट्रीय संकटों, खाड़ी देशों के मुद्दों या चीनी आक्रमण जैसी संवेदनशील परिस्थितियों से निपटने में सक्षम नहीं हैं। गुहा के इस तीखे बयान ने कांग्रेस समर्थकों और बौद्धिक खेमे को स्तब्ध कर दिया, जिसके बाद से ही कांग्रेस के भीतर और बाहर इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं।

रामचंद्र गुहा के इस वार पर पलटवार करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत और तार्किक पोस्ट साझा की। थरूर ने अपने बयान की शुरुआत करते हुए कहा कि रामचंद्र गुहा का यह आकलन कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और यह वास्तविकता से कोसों दूर है। राहुल गांधी के प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय अनुभव पर उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए थरूर ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने पूछा कि जब बराक ओबामा इलिनोइस से पहली बार सीनेटर चुने गए थे, तब उनके पास वैश्विक संकटों को संभालने का कितना अनुभव था? जब वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति बने, तब भी उनके पास अंतरराष्ट्रीय मामलों का कोई व्यापक व्यावहारिक ज्ञान नहीं था, जबकि उस समय अमेरिका कई अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर उलझा हुआ था।

इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए शशि थरूर ने देश के भीतर के राजनीतिक इतिहास का भी संदर्भ दिया। उन्होंने पूछा कि भारत के अंतरराष्ट्रीय और राजनयिक संबंधों को प्रबंधित करने का गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पास प्रधानमंत्री बनने से पहले कितना अंतरराष्ट्रीय अनुभव था? थरूर ने कूटनीतिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली स्पष्ट करते हुए कहा कि कोई भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसी भी वैश्विक या घरेलू संकट से अकेले नहीं निपटता। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सरकार के प्रमुख के पास सलाहकारों, विशेषज्ञों और राजनयिकों की एक पूरी कैबिनेट होती है जो नीति निर्माण में सहयोग करती है।

अपने लेख के अंत में शशि थरूर ने राहुल गांधी के संगठनात्मक अनुभवों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि एक राष्ट्रीय पार्टी की अगुवाई करने के कारण पिछले एक दशक से अधिक समय में राहुल गांधी ने दुनिया भर के नेताओं, विभिन्न नीति निर्माताओं और बाहरी विशेषज्ञों के साथ व्यापक और गहरे संपर्क स्थापित किए हैं। वे देश की समस्याओं और वैश्विक परिस्थितियों को समझने में पूरी तरह सक्षम हैं। थरूर ने जोर देकर कहा कि अनुभव की कमी का यह पूरा विवाद कृत्रिम और निरर्थक है, जिसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए। इस कूटनीतिक और बौद्धिक जंग ने यह साफ कर दिया है कि मुख्यधारा के विचारकों के भीतर भी विपक्ष के नेतृत्व को लेकर राय बंटी हुई है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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