ऑल टाइम लो पर पहुंचा अपना रुपया, क्या सोने-चांदी पर ताला लगाकर आरबीआई बचा पाएगा डूबती करेंसी की साख?
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों द्वारा 2.65 लाख करोड़ रुपये की पूंजी निकालने से घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ा।

अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के बीच चल रहे मुद्रा मूल्य के उतार-चढ़ाव और तुलनात्मक संबंध को दर्शाता एक प्रतीकात्मक ग्राफिक्स।
वैश्विक वित्तीय बाजार में जारी उथल-पुथल और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार गहराता जा रहा है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार छठे कारोबारी सत्र में कमजोर होकर अपने नए सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय इक्विटी बाजार से लगातार की जा रही भारी पूंजी निकासी ने रुपये की स्थिति को बेहद नाजुक बना दिया है। चालू वर्ष में एशियाई मुद्राओं में भारतीय रुपया प्रदर्शन के मामले में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है, जिसने नीति निर्माताओं और केंद्रीय बैंक की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
विदेशी मुद्रा बाजार से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, हालिया कारोबारी सत्र में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.37 के स्तर पर खुला, जबकि इससे पिछले सत्र में यह 96.35 पर बंद हुआ था। कारोबार के दौरान यह गिरकर 96.39 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चला गया था। इस साल अब तक भारतीय मुद्रा में लगभग 5.5 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है। विशेष रूप से 28 फरवरी को ईरान संकट के बाद से रुपये के अवमूल्यन की गति में अभूतपूर्व तेजी आई है। डॉलर सूचकांक का 99.32 के उच्च स्तर पर बने रहना यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी मुद्रा लगातार मजबूत हो रही है, जिससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं कमजोर हो रही हैं।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि रुपये की इस ऐतिहासिक कमजोरी के पीछे कई प्रमुख व्यापक आर्थिक कारक काम कर रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के हालिया बयान के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में करीब दो प्रतिशत की गिरावट आई है और यह 110 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, लेकिन इसके बावजूद तेल की कीमतें अब भी घरेलू अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की ऊंची दरें देश के व्यापार घाटे को सीधे तौर पर बढ़ाती हैं और रुपये पर दबाव डालती हैं।
इसके अतिरिक्त, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा की जा रही आक्रामक और निरंतर बिकवाली रुपये के पतन का दूसरा सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है। आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने चालू वर्ष 2026 में अब तक भारतीय वित्तीय बाजारों से 2.65 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम पूंजी वापस निकाल ली है। यह आंकड़ा पिछले पूरे वर्ष में हुई 3.04 लाख करोड़ रुपये की कुल निकासी के बेहद करीब पहुंच चुका है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपनी हिस्सेदारी बेचकर डॉलर वापस ले जाते हैं, तो घरेलू बाजार में डॉलर की मांग अत्यधिक बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होता जाता है। तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान में रुपये को 96.55 के स्तर पर तात्कालिक समर्थन प्राप्त है, जबकि 96.00 से 96.10 के स्तर पर इसे कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है।
इस विपरीत व्यापक आर्थिक परिदृश्य के बीच, घरेलू शेयर बाजार से कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य मिले हैं। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में करीब 235 अंक यानी 0.31 प्रतिशत की बढ़त के साथ 75,550 के स्तर पर कारोबार करता देखा गया। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी50 सूचकांक भी लगभग 71 अंक की तेजी के साथ 23,721 के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि, शेयर बाजार की इस शुरुआती हरियाली का विदेशी मुद्रा बाजार पर कोई खास सकारात्मक असर नहीं पड़ा और रुपया दबाव में ही बना रहा।
विदेशी मुद्रा बाजार की इस गंभीर स्थिति को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा आगामी दिनों में बाजार में हस्तक्षेप किए जाने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है। केंद्रीय बैंक रुपये के मूल्य को और अधिक गिरने से रोकने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की आपूर्ति बढ़ा सकता है। इसके साथ ही, देश के चालू खाता घाटे को नियंत्रित करने के लिए सोने और चांदी के आयात पर कुछ दंडात्मक अंकुश या कड़े आयात नियम लागू किए जा सकते हैं। इस प्रकार के आधिकारिक वित्तीय उपाय ही आने वाले समय में रुपये को निचले स्तरों पर मजबूत सहारा प्रदान कर सकते हैं।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
