वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मची उथल-पुथल की आंच अब भारत के स्वर्ण भंडार तक पहुंच गई है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की एक होश उड़ाने वाली होलिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने विशाल सोने के भंडार का एक हिस्सा बाजार में बेच दिया है। इस रिपोर्ट के सामने आते ही देश के वित्तीय और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं क्योंकि सामान्यतः केंद्रीय बैंक सोने की खरीद करते हैं, उसे बेचते नहीं हैं। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से इस पूरे मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे मौजूदा आर्थिक संकट से निपटने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देख रहे हैं।

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ भारत अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, रिजर्व बैंक ने २२ मई को समाप्त हुए दो हफ्तों के भीतर लगभग १२ अरब डॉलर यानी करीब १.१४ लाख करोड़ रुपये मूल्य का सोना बेचा है। इसी समय अवधि के दौरान, केंद्रीय बैंक ने करीब ७.५ अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की खरीद भी की है। चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार द्वारा कीमती धातुओं पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी किए जाने के बावजूद केंद्रीय बैंक के सोने के भंडार के मूल्य में गिरावट देखी गई। आर्थिक नियमों के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में आयात शुल्क बढ़ने से बैंक के बुलियन और डॉलर की वैल्यू में बढ़त होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा न होना इस बात का पुख्ता संकेत माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक ने बाजार में सोने की बड़ी लिक्विडेशन यानी बिक्री की है।

इस अप्रत्याशित कदम के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें हैं। मध्य पूर्व में ईरान युद्ध के बढ़ते खतरे और रणनीतिक रूप से संवेदनशील होर्मुज जलडमरू मध्य के बंद होने की आशंकाओं के कारण कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात करता है और वह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। तेल की महंगी कीमतों के कारण देश का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से खर्च हो रहा है, जिसे संतुलित करना बेहद जरूरी हो गया था।

दूसरा बड़ा कारण घरेलू मुद्रा यानी भारतीय रुपये को गिरने से संभालना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते भारत का चालू खाता घाटा लगातार बढ़ रहा है, जिसका सीधा और भारी दबाव रुपये पर देखने को मिल रहा है। विदेशी बाजार के दबाव के कारण रुपया ऐतिहासिक रूप से गिरकर ९५.१७ के स्तर पर पहुंच गया है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए रुपये को और अधिक टूटने से बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया था।

तीसरा कारण लिक्विडिटी यानी बाजार में नकदी की उपलब्धता को प्राथमिकता देना है। संकट के इस दौर में केंद्रीय बैंक सोने जैसी अचल धातु के मुकाबले अधिक लिक्विड और तुरंत इस्तेमाल में आने वाली विदेशी मुद्रा, विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर को अपने पास रखना ज्यादा सुरक्षित मान रहा है ताकि किसी भी आपात स्थिति में बाजार में स्थिरता तुरंत कायम की जा सके। ब्लूमबर्ग की इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा रुपये को स्थिर बनाए रखने के लिए हर संभव विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने से लेकर विदेशी निवेशकों के माध्यम से डॉलर जुटाने जैसे कड़े कदम शामिल हैं। केंद्रीय बैंक द्वारा समय पर किए गए इन हालिया हस्तक्षेपों का ही नतीजा है कि २० मई को रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरने के बाद भी भारतीय रुपये ने अन्य एशियाई मुद्राओं की तुलना में काफी बेहतर जुझारूपन और प्रदर्शन दिखाया है।

अगर घरेलू स्तर पर सोने की सुरक्षा रणनीति की बात करें, तो मार्च महीने के अंत तक भारतीय रिजर्व बैंक के पास कुल ८८०.५२ मीट्रिक टन सोना मौजूद था। इसमें से लगभग सतहत्तर प्रतिशत सोना देश के भीतर बनी सुरक्षित घरेलू तिजोरियों में रखा गया है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महज छह महीने पहले तक भारत में कुल सोने का केवल छियासठ प्रतिशत हिस्सा ही मौजूद था। बाकी का बचा हुआ हिस्सा विदेशी वित्तीय संस्थानों जैसे 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' और 'बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स' की कस्टडी में सुरक्षित रखा हुआ है।

दरअसल, रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुए युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस की संपत्तियों को पूरी तरह फ्रीज कर दिया था। इस घटना के बाद से ही भारतीय रिजर्व बैंक सहित दुनिया के कई उभरते देशों के केंद्रीय बैंकों ने सबक लेते हुए विदेशों में रखे अपने सोने को वापस अपने देश लाने की रफ्तार तेज कर दी है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के भू-राजनीतिक और कूटनीतिक जोखिम से पूरी तरह बचा जा सके। भले ही वर्तमान में रुपये को बचाने के लिए सोने की रणनीतिक बिक्री की खबरें आ रही हों, लेकिन देश के भीतर सोने के भंडार को शारीरिक रूप से सुरक्षित रखने की कवायद लगातार जारी है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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