संसद में Raghav Chadha ने उठाई 'पितृत्व अवकाश' की मांग; कानून में बदलाव का किया आह्वान
संसद में उठी 'पितृत्व अवकाश' को कानूनी अधिकार बनाने की मांग। जानिए क्यों बच्चे के पालन-पोषण में पिता का साथ जरूरी है और मौजूदा कानूनों में बदलाव की क्यों है आवश्यकता।

Raghav Chadha
Paternity Leave Legal Right India : भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर, संसद भवन में आज एक ऐसा मुद्दा गूंजा जो देश के करोड़ों परिवारों की सामाजिक संरचना और लैंगिक समानता से सीधे तौर पर जुड़ा है। सदन की कार्यवाही के दौरान सांसदों ने भारत में 'पितृत्व अवकाश' (Paternity Leave) को एक कानूनी अधिकार बनाने की पुरजोर मांग की है। इस मांग के पीछे का तर्क केवल अवकाश प्राप्त करना नहीं, बल्कि शिशु के जन्म के बाद माता-पिता की साझा जिम्मेदारी को कानूनी मान्यता प्रदान करना है। वर्तमान में, जहां मातृत्व अवकाश को लेकर स्पष्ट कानून मौजूद हैं, वहीं पितृत्व अवकाश के अभाव को आधुनिक समाज की एक बड़ी विसंगति के रूप में देखा जा रहा है।
साझा जिम्मेदारी का संदेश: देखभाल के लिए पिता का साथ जरूरी
संसद में इस विषय को उठाते हुए तर्क दिया गया कि जब भी किसी घर में बच्चे का जन्म होता है, तो बधाई दोनों माता-पिता को दी जाती है, लेकिन पालन-पोषण और देखभाल का सारा बोझ केवल मां के कंधों पर डाल दिया जाता है। इस पारंपरिक सोच को बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया कि एक पिता को अपने नवजात शिशु की देखभाल और अपनी नौकरी बचाने के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। प्रसव के बाद एक महिला को शारीरिक और मानसिक रिकवरी के लिए अपने पति के सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।
संसदीय चर्चा के दौरान उठाए गए प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- कानूनी अधिकार की आवश्यकता: पितृत्व अवकाश को केवल कंपनी की पॉलिसी तक सीमित न रखकर इसे एक 'वैधानिक अधिकार' बनाया जाए।
- पत्नी की देखभाल: पति की जिम्मेदारी केवल बच्चे के प्रति नहीं, बल्कि प्रसव के बाद अपनी पत्नी की स्वास्थ्य देखभाल के प्रति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
- नौकरी की सुरक्षा: कानून ऐसा होना चाहिए जो पिता को बिना वेतन कटौती या नौकरी जाने के डर के, परिवार के साथ समय बिताने की अनुमति दे।
I demanded in Parliament that PATERNITY LEAVE should be a legal right in India.
— Raghav Chadha (@raghav_chadha) March 31, 2026
When a child is born, both parents are congratulated. But caregiving responsibility falls on one. The mother.
A father should not have to choose between caregiving for his newborn and keeping his… pic.twitter.com/sbvC0xfrGO
कानूनी पहलू और वैश्विक परिदृश्य :
भारत में वर्तमान 'मातृत्व लाभ अधिनियम' (Maternity Benefit Act) महिला कर्मचारियों को व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन पुरुषों के लिए केंद्रीय सिविल सेवा (छुट्टी) नियमों के तहत केवल १५ दिनों का सीमित अवकाश मिलता है, जो निजी क्षेत्रों में अनिवार्य नहीं है। संसद में यह मांग उठाई गई कि हमारे कानूनों को आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप ढलना चाहिए। यदि देखभाल एक साझा जिम्मेदारी है, तो कानून में भी यह समानता झलकनी चाहिए। इस मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए इसे एक सामाजिक सुधार के रूप में पेश किया गया, जिससे कार्यस्थलों पर महिलाओं के प्रति भेदभाव भी कम होगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
