नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और ईरान युद्ध के कारण उपजे सप्लाई संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की 'एनर्जी सिक्योरिटी' को सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशन पर निकल रहे हैं। अपनी पांच दिवसीय यूरोप यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री का संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में संक्षिप्त ठहराव न केवल कूटनीतिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की रसोई और देश की अर्थव्यवस्था की गति निर्धारित करने वाला साबित हो सकता है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यूएई में प्रधानमंत्री के तीन घंटे के प्रवास का मुख्य एजेंडा भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और एलपीजी आपूर्ति को पुख्ता करना है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही बाधित होने के कारण कच्चे तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकीर्ण समुद्री मार्ग से गुजरता है, जो वर्तमान में युद्ध की विभीषिका के कारण लगभग ठप है। ऐसी स्थिति में यूएई भारत के लिए एक जीवनरेखा बनकर उभरा है। यूएई ने अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए फुजैरा पोर्ट के माध्यम से होर्मुज स्ट्रेट को बाईपास कर तेल निर्यात जारी रखा है। यही कारण है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए यूएई के साथ अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाना चाहता है।

प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान दो प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर होने की प्रबल संभावना है। पहला समझौता एलपीजी (तरल पेट्रोलियम गैस) की निर्बाध आपूर्ति से संबंधित है, जिससे देश में गैस की संभावित किल्लत को समय रहते रोका जा सके। दूसरा महत्वपूर्ण समझौता 'स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (SPR) को लेकर है। भारत अपनी आपातकालीन तेल भंडारण क्षमता को बढ़ाने पर काम कर रहा है और इसमें यूएई का सहयोग भारत की संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यूएई पहले से ही भारत का चौथा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी और एलएनजी स्रोत है।

सांख्यिकीय दृष्टिकोण से देखें तो यूएई वर्तमान में प्रतिदिन 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन कर रहा है और ओपेक प्लस से बाहर आने के बाद उसने अगले वर्ष तक इसे 5 मिलियन बैरल तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए आपूर्ति में मामूली रुकावट भी भारतीय बाजार में महंगाई और किल्लत को जन्म दे सकती है। प्रधानमंत्री मोदी का यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के साथ संवाद न केवल ऊर्जा सहयोग पर केंद्रित होगा, बल्कि इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा और 45 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों के हितों पर भी चर्चा की जाएगी।

इस यात्रा का समापन और इन समझौतों का कार्यान्वयन भारत को भविष्य के ऊर्जा झटकों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करेगा। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ईंधन की बचत करने की अपील की है, वहीं दूसरी ओर वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए सक्रिय कूटनीति का परिचय दे रहे हैं। यह रणनीतिक कदम दर्शाता है कि भारत बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कितना मुस्तैद है। आने वाले दिनों में ये समझौते भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने और आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले बोझ को कम करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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