गयाजी में पितृपक्ष मेला महासंगम-2026 पूरी तरह से परवान पर है और देश के विभिन्न राज्यों से अपने पितरों की मोक्ष की कामना लेकर भारी संख्या में पिंडदानी गयाजी पहुंच चुके हैं। तीर्थयात्रियों की इस विशाल भीड़ से शहर का उत्तरी इलाका पूरी तरह से पट गया है। सोमवार की रात तक लगभग नौ लाख पिंडदानी गयाजी पहुंच चुके हैं, और अकेले विष्णुपद मंदिर में तीन लाख पिंडदानियों की आवाजाही का अनुमान लगाया गया है।

आश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया पर त्रिपाक्षिक गयाश्राद्ध करने पहुंचे पिंडदानियों ने पंचतीर्थ में पूरी श्रद्धा के साथ पिंडदान किया। सूर्यकुंड और पितामहेश्वर तालाब में तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ उमड़ रही है। इन दोनों स्थानों की पांच वेदियों पर गयाश्राद्ध कर पिंडदानी अपने पितरों के सूर्यलोक गमन की कामना कर रहे हैं। विष्णुनगरी में अब त्रिपाक्षिक गयाश्राद्ध की तुलना में एक, तीन, पांच और सात दिन वाले गयाश्राद्ध करने वालों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी देखने को मिली है। सुबह से लेकर दोपहर तक विष्णुपद मंदिर तथा फल्गु नदी के रबर डैम से लेकर श्मशान घाट तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

विष्णुपद, सीताकुंड और प्रेतशिला की पिंडवेदियां दिनभर पिंडदान के वैदिक मंत्रोच्चार से गूंजती रहीं। सुबह पांच बजे से ही पितामहेश्वर इलाके में स्थित उत्तरमानस वेदी पर त्रिपाक्षिक गयाश्राद्ध करने वाले पिंडदानियों का आना शुरू हो जाता है। पांच कोण वाले पितामहेश्वर तालाब में पिंडदान चल रहा है, जहां उमड़ने वाली भीड़ के सामने तालाब का परिसर छोटा पड़ता नजर आ रहा है। तालाब के बाहर बने शेड, पितामहेश्वर घाट के साथ-साथ सड़क किनारे और गलियों में दरी-चादर पर बैठकर तीर्थयात्रियों ने अपने कर्मकांड पूरे किए।

श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभूलाल विट्ठल और सचिव गजाधर लाल पाठक ने जानकारी दी कि सोमवार को पंचतीर्थ के तहत पांच वेदियों पर पिंडदान संपन्न हुआ। हालांकि, सबसे अधिक भीड़ एक दिनी श्राद्ध के तहत फल्गु, विष्णुपद और अक्षयवट में जुट रही है। प्रेतयोनि से मुक्ति पाने के लिए प्रेतशिला सहित अन्य सभी वेदियों पर भी श्रद्धालुओं की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।

आश्विन कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि यानी मंगलवार को बोधगया की वेदियों पर पिंडदान का विधान है। त्रिपाक्षिक पिंडदान करने वाले श्रद्धालु पितृपक्ष के चौथे दिन बोधगया की तीन वेदियों पर कर्मकांड करेंगे। बोधगया में सरस्वती स्नान, तर्पण और मातंगवापी तथा धर्मारण्य वेदी पर कर्मकांड किए जा रहे हैं। पिंडदान के बाद तीर्थयात्री महाबोधि मंदिर में जाकर बोधिवृक्ष के दर्शन भी कर रहे हैं।

धर्मारण्य, मतंगवापी और सरस्वती वेदी मतंग ऋषि और भगवान बुद्ध की पावन तपस्थली रही है। मुख्य रूप से त्रिपाक्षिक गयाश्राद्ध करने वाले इन तीन वेदियों पर पिंडदान करते हैं। सरस्वती नदी में तर्पण और पिंडदान के साथ धर्मारण्य तीर्थ पर गयाश्राद्ध के बाद पिंड को वहां स्थित कुएं में डालने की परंपरा है। इस दौरान विष्णु स्वरूप बोधिवृक्ष को नमन करना भी जरूरी माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने पिंडदान करने के बाद महाबोधि मंदिर में दर्शन-पूजन किए थे। तीर्थयात्री पितृश्राद्ध के साथ-साथ देवकुल और ऋषिकुल का देवऋण व ऋषिऋण चुकाने के लिए भी पिंडदान करते हैं।

पितामहेश्वर में पिंडदान संपन्न होने के बाद त्रिपाक्षिक पिंडदानी सूर्यकुंड स्थित पंचतीर्थ की अन्य वेदियों पर पहुंचे। यहां उदीचि, कनखल व दक्षिणमानस पर तीर्थयात्रियों ने पिंड अर्पित कर अपने पितरों के मोक्ष की कामना की। उत्तर मानस पर कर्मकांड पूरा करने के बाद श्रद्धालुओं ने मां शीतला मंदिर में स्थित उतरार्क भगवान सूर्य का दर्शन और पूजन किया। इसके पश्चात तीर्थयात्री देवघाट पहुंचे, जहां शंकराचार्य मठ के पास स्थित जिह्वालोल वेदी पर तिथि का अंतिम श्राद्धकर्म किया गया। इसके बाद विष्णुपद मंदिर में पूजा-अर्चना कर सभी अपने-अपने गंतव्य की ओर लौट गए।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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