अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक उथल-पुथल और वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची हलचल का सीधा असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर दिखने लगा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में एक बार फिर बड़ी बढ़ोतरी कर आम आदमी को महंगाई का करारा झटका दिया है। पिछले दस दिनों के भीतर यह चौथी बार है जब वाहन ईंधन के दामों में वृद्धि की गई है। इस ताजा बढ़ोतरी के बाद देश के सभी प्रमुख महानगरों में ईंधन के दाम मई 2022 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। लगातार हो रही मूल्यवृद्धि ने न केवल आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट को बिगाड़ दिया है, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने के कारण आने वाले दिनों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।

ताजा संशोधन के तहत पेट्रोल की कीमतों में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल के दामों में 2.71 रुपये प्रति लीटर का बड़ा इजाफा किया गया है। इस वृद्धि के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत बढ़कर 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 95.20 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गई है। देश के अन्य महानगरों की स्थिति और भी गंभीर है। कोलकाता में पेट्रोल अब 113.51 रुपये और डीजल 99.82 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक रहा है। वाणिज्यिक राजधानी मुंबई में उपभोक्ताओं को एक लीटर पेट्रोल के लिए 111.21 रुपये और डीजल के लिए 97.83 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं, जबकि चेन्नई में यह दर क्रमशः 107.77 रुपये और 99.55 रुपये प्रति लीटर निर्धारित की गई है। इस मूल्यवृद्धि से ठीक पहले भी तेल कंपनियों ने वाहन ईंधन के साथ-साथ सीएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी की थी, जिससे चौतरफा महंगाई का दबाव बढ़ गया है।

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आ रही इस बेतहाशा तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में उपजा गहरा सुरक्षा संकट है। अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद उपजे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य आंशिक रूप से अवरुद्ध हो गया है। इस रणनीतिक मार्ग के बाधित होने से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं। भारतीय तेल कंपनियों का कहना है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, रिफाइनिंग मार्जिन में आई भारी कमी और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने की वजह से घरेलू स्तर पर खुदरा दाम बढ़ाना उनकी विवशता बन गया था।

इस पूरे घटनाक्रम पर देश में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लंबे समय से वृद्धि हो रही थी, लेकिन सरकार पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के संपन्न होने का इंतजार कर रही थी। विपक्ष का दावा है कि उपभोक्ताओं को राजनीतिक लाभ के लिए चुनावी प्रक्रिया के दौरान राहत दी गई और चुनाव खत्म होते ही लगातार चार बार कीमतें बढ़ाकर आम जनता पर आर्थिक बोझ डाल दिया गया। दूसरी तरफ, सरकारी सूत्रों और तेल कंपनियों ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि विपरीत वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद खुदरा ईंधन विक्रेताओं ने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखा था ताकि घरेलू बाजार को अचानक लगने वाले झटकों से बचाया जा सके।

प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टिकोण से देखें तो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस मूल्यवृद्धि को तेल कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अनिवार्य बताया है। मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, इस सप्ताह की शुरुआत में कीमतों में की गई वृद्धि से तेल कंपनियों के दैनिक घाटे में करीब एक चौथाई की कमी आई है। इसके बावजूद, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां वर्तमान में भी प्रतिदिन लगभग 750 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार से बढ़ती लागत पर कच्चा तेल खरीदने और उसे घरेलू बाजार में कम दरों पर बेचने के कारण कंपनियों का अंडर-रिकवरी मार्जिन लगातार बढ़ रहा था, जिसे संतुलित करने के लिए ये सुधारात्मक कदम उठाने पड़े हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का यह संकट जल्द ही शांतिपूर्ण तरीके से नहीं सुलझा, तो आने वाले हफ्तों में ईंधन की कीमतों में और अधिक वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार की छोटी सी हलचल भी देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता और राजकोषीय गणित को प्रभावित करती है। बहरहाल, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दी गई दो रुपये की राहत अब पूरी तरह बेअसर हो चुकी है और मई 2022 के बाद के इस उच्चतम मूल्य स्तर ने देश के नीति निर्माताओं के सामने महंगाई पर काबू पाने और आर्थिक विकास की रफ्तार को बनाए रखने की एक नई तथा बेहद जटिल चुनौती खड़ी कर दी है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story