पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी: क्या फिर हो सकती है सरहद पार से कोई बड़ी साजिश?

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पिछले वर्ष हुए भीषण आतंकी हमले की गूंज आज भी सुरक्षा गलियारों और आम नागरिकों के जेहन में ताजा है। 22 अप्रैल 2025 को हुए उस नृशंस हमले में 26 बेगुनाह नागरिकों की जान गई थी, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। इस हमले के ठीक एक साल बाद आज सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा है कि क्या इतिहास स्वयं को दोहरा सकता है। भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एम.के. कटियार ने इस संदर्भ में एक गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो पाकिस्तानी सेना की आंतरिक राजनीति और उसके 'भारत-विरोधी' नैरेटिव की परतों को खोलता है। उनके अनुसार, पहलगाम जैसी घटना का दोबारा होना काफी हद तक पाकिस्तानी जनरलों के अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जिद पर निर्भर करता है।

पहलगाम हमले के पखवाड़े भर बाद भारत द्वारा शुरू किया गया 'ऑपरेशन सिंदूर' सैन्य कौशल और निर्णायक नेतृत्व का एक सशक्त उदाहरण था। इस ऑपरेशन ने न केवल आतंकियों के ठिकानों को ध्वस्त किया, बल्कि पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भारत अब किसी भी उकसावे का जवाब देने में सक्षम और तत्पर है। हालांकि, जनरल कटियार चेतावनी देते हैं कि पाकिस्तानी सेना का इतिहास सुलह के बजाय टकराव की ओर अधिक झुका रहा है। पाकिस्तान की स्थापना के समय से ही वहां की संस्थाओं ने एक ऐसे नैरेटिव को जन्म दिया है जो भारत विरोध पर टिका है। इसी नैरेटिव के दम पर वहां की सेना ने सत्ता के गलियारों में अपना वर्चस्व बनाए रखा है और जिसने भी इस वर्चस्व को चुनौती दी, उसे या तो रास्ते से हटा दिया गया या जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

वर्तमान परिदृश्य में पाकिस्तानी सेना स्वयं को एक सुरक्षित स्थिति में प्रदर्शित करने का प्रयास कर रही है। वैश्विक पटल पर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की सुर्खियां बटोरकर वह अपनी साख बनाने में जुटी है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। पाकिस्तान इस समय अपनी सबसे खराब आर्थिक स्थिति से गुजर रहा है। खाड़ी देशों की उथल-पुथल ने उसकी नाजुक अर्थव्यवस्था को और भी जर्जर कर दिया है। इसके साथ ही अफगान सीमा पर बढ़ती अस्थिरता और बलूच नेशनल आर्मी के साथ चल रहा तीव्र संघर्ष सेना के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बेरोकटोक हमले और काबुल के साथ बढ़ते तनाव ने पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की रणनीतिक विफलता को उजागर किया है।

सबसे बड़ा खतरा उन आतंकी संगठनों से है जिन्हें कभी भारत के खिलाफ 'प्रॉक्सि वार' के लिए पाला गया था। अब जब अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उन्हें संरक्षण मिलना कम हो रहा है, तो ये संगठन अपने ही संरक्षक का हाथ काटने को तैयार हैं। जनरल कटियार का मानना है कि अपनी गिरती साख और देश के भीतर बढ़ते असंतोष से ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तानी सेना भारत में किसी बड़े आतंकी हमले को प्रायोजित कर सकती है। यह एक ऐसा दुस्साहस होगा जिसका उद्देश्य भारत को जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाकर स्वयं को पुनः 'राष्ट्रीय रक्षक' के रूप में स्थापित करना होगा। अंततः, क्या पहलगाम दोबारा होगा, इसका जवाब रावलपिंडी के उन स्वार्थी जनरलों के पास है जो अपनी सत्ता बचाने के लिए अपने ही देश को भारी कष्ट में झोंकने के लिए तैयार रहते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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