एक कत्लेआम और खत्म हो गया साम्राज्य; नेपाल के 240 साल पुराने राजतंत्र के खात्मे की वो खूनी दास्तां
दुनिया की आख़िरी हिंदू राजशाही भारत में नहीं, बल्कि नेपाल में रही। 240 वर्षों तक शासन करने वाले शाह वंश और राजा ज्ञानेंद्र का अंत 2008 में हुआ, जब नेपाल धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना। शाही महल नरसंहार, माओवादी विद्रोह और लोकतंत्र आंदोलन ने इस ऐतिहासिक बदलाव की नींव रखी।

King Gyanendra Nepal : जब हिंदू राजाओं और राजशाही के इतिहास की चर्चा होती है, तो सामान्यतः भारत का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लेकिन ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि दुनिया की सबसे आख़िरी और सबसे लंबे समय तक चली हिंदू राजशाही भारत में नहीं, बल्कि पड़ोसी देश नेपाल में कायम रही। लगभग 240 वर्षों तक शासन करने वाले शाह वंश का अंत वर्ष 2008 में हुआ और इसी के साथ राजा ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह विश्व के अंतिम हिंदू राजा के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए।
नेपाल दशकों तक आधिकारिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र रहा, जहां राजा न केवल राजनीतिक सत्ता का केंद्र था, बल्कि उसे हिंदू परंपराओं और धार्मिक मूल्यों का संरक्षक भी माना जाता था। यह व्यवस्था 18वीं सदी से लेकर 21वीं सदी तक चली, लेकिन घटनाओं की एक श्रृंखला ने अंततः इस राजशाही को समाप्त कर दिया।
नेपाल: दुनिया का आख़िरी हिंदू साम्राज्य
नेपाल में हिंदू राजशाही की नींव 1768 में पृथ्वी नारायण शाह ने रखी थी। उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों को एकजुट कर आधुनिक नेपाल का निर्माण किया। शाह वंश ने इसके बाद लगातार शासन किया और देश को एक हिंदू साम्राज्य के रूप में स्थापित रखा।
1990 के दशक में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बावजूद राजा की भूमिका एक सशक्त संवैधानिक शासक के रूप में बनी रही।
शाही महल का नरसंहार: विश्वास की नींव हिली
नेपाल की राजशाही के इतिहास में 1 जून 2001 एक निर्णायक तारीख बन गई। इसी दिन काठमांडू के नारायणहिती शाही महल में हुए नरसंहार में राजा बीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या और शाही परिवार के कई सदस्य मारे गए।
आधिकारिक जांच में युवराज दीपेंद्र को इस हत्याकांड का दोषी ठहराया गया, लेकिन परिस्थितियों और सवालों ने जनता के मन में गहरा संदेह पैदा कर दिया। इस घटना ने राजशाही की नैतिक और धार्मिक पवित्रता को गंभीर रूप से आहत किया।
राजा ज्ञानेंद्र का सत्ता केंद्रीकरण :
नरसंहार के बाद राजा ज्ञानेंद्र सिंहासन पर बैठे, लेकिन उन्हें जनता का व्यापक समर्थन नहीं मिल सका।
वर्ष 2005 में, उन्होंने चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया, आपातकाल लागू किया, मीडिया पर सेंसरशिप लगाई और शासन की बागडोर सीधे अपने हाथ में ले ली। यह कदम व्यवस्था बहाल करने के बजाय, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और आम जनता को उनके खिलाफ एकजुट कर गया।
माओवादी विद्रोह और लोकतंत्र आंदोलन :
नेपाल पहले से ही 1996 से 2006 तक चले माओवादी विद्रोह से जूझ रहा था, जिसमें 16,000 से अधिक लोगों की जान गई।
2006 में माओवादी विद्रोहियों और सात प्रमुख राजनीतिक दलों ने मिलकर लोकतंत्र आंदोलन शुरू किया। देशभर में हुए व्यापक जनप्रदर्शनों ने राजा ज्ञानेंद्र को कार्यकारी शक्तियां छोड़ने और संसद बहाल करने के लिए मजबूर कर दिया।
2008: हिंदू राजशाही का औपचारिक अंत :
शांति समझौते और आम चुनावों के बाद 28 मई 2008 को नेपाल की संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक हुई।
इस बैठक में 601 में से 560 सदस्यों ने राजशाही समाप्त करने के पक्ष में मतदान किया। इसके साथ ही नेपाल को आधिकारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया।
राजा ज्ञानेंद्र को 15 दिनों के भीतर नारायणहिती पैलेस खाली करने का आदेश दिया गया। उन्होंने बिना किसी विरोध के महल छोड़ा और नागार्जुन पैलेस चले गए। इस तरह 240 साल पुरानी हिंदू राजशाही का शांतिपूर्ण अंत हुआ।
आज भी जीवित है राजशाही की बहस :
दिलचस्प तथ्य यह है कि राजशाही समाप्त होने के वर्षों बाद भी नेपाल राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। इसी कारण हाल के वर्षों में राजशाही समर्थक और हिंदू राष्ट्र समर्थक आंदोलन फिर से उभरते दिखाई दे रहे हैं।
नेपाल की एक बड़ी आबादी अब भी संवैधानिक हिंदू सम्राट की वापसी की मांग कर रही है, जिससे यह विषय आज भी दक्षिण एशिया की राजनीति में प्रासंगिक बना हुआ है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
