उमर अब्दुल्ला की नाराजगी खुलकर आई सामने, बोले- राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी का राजनीतिक नुकसान हमें हो रहा|
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य का दर्जा बहाल करने की समय-सीमा स्पष्ट नहीं होने से उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात, राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी को लेकर मुख्यमंत्री के बयान के संदर्भ में।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा बहाल करने में हो रही निरंतर देरी को लेकर गंभीर चिंता और गहरी नाराजगी व्यक्त की है। उनका कहना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर बार-बार बदलती और टलती समय-सीमा के कारण स्थानीय जनता में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है, और इसका सीधा राजनीतिक नुकसान उनकी सरकार को उठाना पड़ रहा है। हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में मुख्यमंत्री ने इस बात को खुलकर स्वीकार किया कि राज्य के दर्जे की बहाली में हो रही इस लंबी प्रशासनिक और राजनीतिक देरी ने उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक साख को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। जनता के बीच यह धारणा तेजी से घर करती जा रही है कि केंद्र सरकार द्वारा पूर्व में किए गए वादे धरातल पर पूरे नहीं हो रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें उन फैसलों और प्रशासनिक विसंगतियों की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ रही है, जिनमें उनकी अपनी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही है।
मुख्यमंत्री ने इस पूरी प्रक्रिया की तुलना एक ऐसी मैराथन दौड़ से की है, जिसका लक्ष्य लगातार आगे की तरफ खिसकता जाता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब भी उनकी सरकार तयशुदा अंतिम रेखा के करीब पहुंचती है, तो केंद्र सरकार द्वारा उस लक्ष्य को और आगे बढ़ा दिया जाता है। इस स्थिति ने प्रशासन के सामने एक अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि इस दिशा में स्पष्ट मानदंड और समय-सीमा तय की जानी चाहिए ताकि निर्वाचित सरकार के पास काम करने के लिए एक निश्चित लक्ष्य मौजूद हो। इसके साथ ही उन्होंने उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें यह कहा जाता है कि जब तक क्षेत्र से आतंकवाद का पूरी तरह सफाया नहीं हो जाता, तब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र शासित प्रदेश में सक्रिय सुरक्षा तंत्र पर उनकी निर्वाचित सरकार का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है और आतंकवाद विरोधी तंत्र से उनका कोई सीधा लेना-देना नहीं है।
प्रशासनिक कामकाज में आ रही बाधाओं और विसंगतियों को रेखांकित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि एक विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश में शासन चलाना बेहद जटिल हो गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर ऊर्जा विकास निगम और प्रतिष्ठित शेर-ए-कश्मीर चिकित्सा विज्ञान संस्थान जैसे कई प्रमुख संस्थान अब भी सीधे तौर पर उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र के अधीन आते हैं। वर्तमान व्यवस्था के तहत उनके मंत्रिमंडल के पास अपने प्रशासनिक सचिवों का चयन करने या राज्य के लिए महाधिवक्ता की नियुक्ति करने तक का प्रशासनिक अधिकार नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की व्यवस्था खराब शासन प्रणाली का एक अनूठा उदाहरण है।
अनुच्छेद 370 से जुड़े मामलों पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि संवैधानिक शक्तियों के किसी भी प्रकार के विभाजन और पुनर्वितरण के लिए राज्य का दर्जा बहाल होना एक अनिवार्य पूर्व कानूनी शर्त है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 मूल रूप से केंद्र सरकार और एक पूर्ण राज्य की सरकार के बीच शक्तियों का संवैधानिक बंटवारा था, और जब राज्य का अस्तित्व ही नहीं है तो राज्य सूची जैसी परिकल्पना कैसे प्रभावी हो सकती है। इसलिए अनुच्छेद 370 की किसी भी वैधानिक चर्चा से पहले राज्य का दर्जा बहाल करना बेहद जरूरी है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन दौरों का भी जिक्र किया जिनमें उन्होंने क्षेत्र के विकास और राज्य का दर्जा बहाल करने की व्यक्तिगत रूप से प्रतिबद्धता जताई थी, जिसे उन्होंने एक सामान्य राजनीतिक आश्वासन के बजाय एक स्पष्ट 'मोदी का वादा' करार दिया।
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो जाता है कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार और केंद्र के बीच प्रशासनिक अधिकारों और राज्य के दर्जे को लेकर खींचतान जारी है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता दांव पर लगाकर जनता के सवालों का सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्र की ओर से स्पष्ट समय-सीमा न मिलने के कारण राजनीतिक अनिश्चितता का यह दौर लगातार लंबा होता जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस राजनीतिक और प्रशासनिक गतिरोध को समाप्त करने के लिए क्या कदम उठाती है और कब तक राज्य के दर्जे की बहाली का वादा जमीनी हकीकत का रूप ले पाता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
